साहिर लुधियानवी: ‘मैं हर इक पल का शायर हूं, हर इक पल मेरी कहानी है’

साहिर उन नगीनों में से हैं जिनकी चमक आज भी बरक़रार है. बतौर शायर साहिर लुधियानवी की लोकप्रियता सिर्फ हिंदुस्तान में नहीं बल्कि समूचे एशिया में है. वो कमाल के शायर थे. गुलजार साहब उन्हें जादूगर कहते हैं. साहिर उन चंद शायरों में थे जिनके लिखे फिल्मी गाने गायक या संगीतकार के साथ-साथ उनकी कलम के जादू की वजह से भी हिट होते थे. जिंदगी के उतार चढ़ाव और प्यार भरे लम्हों को अपनी शायरी और गानों में उतारने वाले साहिर की नज़्मों और गज़लों में सिर्फ मुहब्बत के तराने ही शामिल न थे. एक विद्रोह, क्रांति की गूंज भी थी.

8 मार्च, 1921 को पंजाब के लुधियाना शहर में एक जमींदार परिवार में जन्में साहिर की जिंदगी काफी संघर्षों में बीती. लेखन के इस जादूगर का असली नाम अब्दुल हई फ़ज़ल मुहम्मद था. उन्होंने अपनी मैट्रिक तक की पढ़ाई लुधियाना के खालसा स्कूल से पूरी की. इसके बाद वह लाहौर चले गए, जहां उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई सरकारी कॉलेज से पूरी की.

साहिर लुधियानवी की पारिवारिक जीवन उथलपुथल भरा रहा. ऐसा कहा जाता है कि उनके पिता ने अपने जीवन में दस से ज्यादा शादियां कीं. आखिर में उनकी इन्हीं आदतों से नाराज होकर साहिर लुधियानवी की मां ने उन्हें साथ लेकर घर छोड़ दिया. साहिर उस वक्त बहुत छोटे थे.

साहिर के घर परिवार में शेरो-शायरी का दूर दूर तक कोई चलन नहीं था. लेकिन साहिर को शायरी की समझ दी फैयाज हरयाणवी ने.

साहिर ने 15-16 साल की उम्र में खुद भी शायरी कहनी शुरू कर दी थी. उन दिनों कीर्ति लहर नाम की एक पत्रिका प्रकाशित होती थी. साहिर की तमाम गजले और नज्में उस किताब में प्रकाशित होती थीं.

साहिर लुधियानवी को उनके कॉलेज में जबरदस्त तौर पर पसंद किया जाने लगा था. उनके प्रेम प्रसंग भी काफी चर्चा में रहते थे. उनकी लोकप्रिय रचना ‘ताजमहल’ ने उन्हें जबरदस्त लोकप्रियता दिला दी थी.

इन सारी बातों के बावजूद उन्हें कॉलेज से निकाला गया. कहा जाता है कि कॉलेज से निकाले जाने के पीछे उनके प्रेम प्रसंग ही थे.

साहिर लुधियानवी के पहले कविता संग्रह का नाम था- तल्खियां. ये संग्रह 1945 में यानि आजादी से पहले प्रकाशित हुआ था. इस किताब के प्रकाशित होने के तुरंत बाद साहिर एक स्थापित शायर के तौर पर पहचाने जाने लगे.

1945 के 10 साल बाद यानि 1955 में साहिर लुधियानवी का दूसरा कविता संग्रह आया. उस कविता संग्रह का शीर्षक था- ‘परछाईंया’.

आजादी के बाद साहिर की मां को पहले रिफ्यूजी कैंप में रखा गया और उसके बाद उन्हें लाहौर भेज दिया गया था. करीब एक-डेढ़ महीने तक पता लगाने के बाद साहिर लुधियानवी पाकिस्तान अपनी मां से मिलने लाहौर गए. इसके बाद वो कई महीने वहां रहे भी. लेकिन उन्हें पाकिस्तान रास नहीं आया. वो वापस हिंदुस्तान आ गए.

साहिर ने 1950 में प्रदर्शित ‘आजादी की राह पर’ फिल्म में अपना पहला गीत ‘बदल रही है जिंदगी’ लिखा. 60 के दशक से लेकर अपनी जिंदगी के रहने तक उन्होंने बतौर गीतकार बेशुमार सुपरहिट गाने लिखे. साहिर के लिखे सुपरहिट गानों की तादाद सैकड़ों में है.

1963 में फिल्म ‘ताजमहल’ और 1976 में फिल्म ‘कभी-कभी’ के लिए गीत के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजा गया था.

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