देश में मोदी विरोध और देश द्रोह !

-सचिन चौधरी, संपादक, बुंदेली बौछार

आज के माहौल में बड़ी हिम्मत करके यह लिखने पर मजबूर हुआ हूं। लेकिन सच्चाई यह है कि यह बात आज कहीं ज्यादा सार्थक और प्रासंगिक होगी। देश में बड़ा सवाल चल पड़ा है। या तो आप देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक हों या फिर आप देश द्रोही या पाकिस्तानी सिद्ध कर दिए जायेंगे।

इस सवाल का जवाब तलाशने का बहुत प्रयास किया तो अचानक भगवान् महावीर का स्याद्वाद सिद्धांत याद आया। यह सिद्धांत कहता है कि यदि किसी विषय पर आप सत्य हैं तो जरूरी नहीं कि दूसरा भी असत्य हो। एक ही मुद्दे पर कई लोग अलग-अलग तरीके से सहमत हो सकते हैं। लेकिन बीते 4-5 सालों में हिंदुस्तान में अजब सा माहौल बना है या तो आप भक्त हो, या चमचे।

तीसरे विकल्प का स्थान ही दिखाई नहीं पड़ता। खैर स्याद्वाद सिद्धांत पर ही आगे बढ़ते हुए शुरुआत दूसरे पक्ष से करते हैं। बीते दिनों पुलवामा में हुए हमले के बाद यदि आप इस देश के प्रधानमंत्री, या इस देश की सरकार के साथ नहीं थे तो मेरे विचार से वाकई आप देशद्रोह की श्रेणी के हकदार हैं। क्यूंकि युद्ध के समय यदि आप अपने देश के शासक के साथ नहीं है तो आप इस देश के साथ नहीं है। ऐसी स्थिति में आप नरेंद्र मोदी या भाजपा सरकार के नहीं बल्कि हिंदुस्तान की सरकार के साथ खड़े होते हैं। ख़ुशी की बात यह है कि एकाध अपवाद को छोड़ दें तो बाकी सब इस विषय पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर सरकार के साथ दिखे।

अब दूसरा पहलू। युद्ध का उन्माद समाप्त सा है। हमने बीते दो हफ्तों में लगभग 60 जवानों को खोया। पाकिस्तान ने कितनों को खोया इसका जवाब न तो पाकिस्तान दे रहा है न कभी देगा। परन्तु देश की सरकार से यदि कोई आम नागरिक की हैसियत से यह सवाल पूछे तो?

इस सवाल का जवाब देना जरूरी भी नहीं है। ;लेकिन सवाल पूछने पर सेना के अपमान की आड़ लेकर देश द्रोही और पाकिस्तानी साबित करना कहां तक उचित है। यह विषय तो फिर भी हमारे देश की सुरक्षा सम्मान से जुड़ा है। लेकिन बीते सालों में मोदी विरोध को ही देश द्रोह से जोड़ दिया गया। दिल्ली, बिहार जैसे महत्वपूर्ण चुनावों में खुले तौर पर भाजपा नेताओं ने कहा कि या तो भाजपा को वोट दो या पाकिस्तान चले जाओ। यह कौन सा माहौल है भाई।

अब आपका सवाल यह हो सकता है कि आखिर प्रधानमंत्री तो देश के प्रधानमंत्री हैं। फिर उनके लिए ऐसी बातें क्यों। तो यही सवाल ही असल उत्तर है। बीते सालों में देश के प्रधानमंत्री पद की परिभाषा बदली गई है। देश के प्रधानमंत्री ने सरकारी आयोजन, मीडिया, सोशल मीडिया पर बतौर प्रधानमंत्री देश के विकास से ज्यादा विपक्ष को निशाने पर लिया है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के स्टार प्रचारक नरेंद्र मोदी के बीच का अंतर ख़त्म सा हो चला है। मोदी समर्थक भी उनको प्रधानमंत्री से ज्यादा भाजपा के महामानव के तौर पर मानते हैं और विपक्षी या आलोचक भी इनकी कार्य प्रणाली पर सीधे सवाल उठाते हुए दिखते हैं।

इसलिए सिर्फ एक निवेदन है, माननीय प्रधानमंत्री जी। यदि आप भारत के प्रधानमंत्री और भाजपा के प्रमुख चेहरे की अपनी भूमिकाओं को अलग अलग परिभाषित करेंगे तो इस मुल्क के प्रधानमंत्री का यथोचित सम्मान आपको हर हाल में मिलेगा। यदि कोई कमी भी रही तो समीक्षा होगी आलोचना नहीं। वही राजनीति में तो मर्यादाओं की बात करना ही बेमानी है। सो वहां न दूसरों को आपसे आपत्ति होगी और न आपको किसी और से। एक छोटा सा निवेदन स्वीकार होगा तो इस देश में मोदी विरोधी आलोचक की श्रेणी पायेगा और प्रधानमंत्री का विरोधी गद्दार या देश द्रोही….

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