महिला दिवस विशेष: मैं स्त्री हूँ !

आदरणीय
भारतीय समाज,
मैं स्त्री हूँ…वही अभागन स्त्री जिसे तुम न जाने कब कौन सा ‘नाम’ और कब कौन सा ‘उपमान’ दे देते हो…न जाने कब तुमने मुझे परम्पराओं ,कुरीतियों और विचारों की बेड़ियों में जकड़ दिया । हालाकिं इतिहास के पन्नों में मेरी स्वर्णिम गाथा है। अगर वेदों का अध्ययन करो तो उसमें यह साफ़ देखने को मिलता है कि उस वक़्त की स्त्रियों को अपनी शिक्षा पूरी करने की छूट थी तथा उनका विवाह भी उनके रजामंदी से होता था। गार्गी और मैत्रयी नाम की दो महिला संतो का उदाहरण ऋग्वेद और उपनिषदों में दिया हुआ है। इतिहास की मानो तो महिलाओं का पतन स्मृतियों (मनुस्मृति) के साथ शुरू हुआ। धीरे धीरे भारत में इस्लामी और ईसाई आगमन से महिलाओं से उनके हक़ छिनते चले गए। महिलाएं सामाजिक बेड़ियों में बंधकर रहने लगी जिनमें प्रमुख थी सती प्रथा, बाल—विवाह, बालश्रम, विधवाओं के पुनःविवाह पर रोक आदि।

मैं पांच पतियों की पत्नीव्रता ‘द्रौपदी’ हूँ, 14 वर्ष पति के साथ वनवास के गुजारने वाली ‘सीता’ हूं , उदासीन और त्याग की मूरत ‘उर्मिला’ हूँ, मैं ‘सावित्री’ हूँ, मैं ‘श्वेत पद्मासना’ हूँ, ‘लक्ष्मी’ हूँ अच्छा सुनो न……इन सबके साथ मैं ‘चंडी’ और ‘दुर्गा’ भी हूँ….मुझे लक्ष्मी और सरस्वती के साथ साथ चंडी के रूप में भी स्वीकारो । ठीक वैसे हैं जैसे मैंने तुम्हे ‘दुर्योधन’ , ‘रावण’ के साथ साथ ‘राम और लक्ष्मण’ के रूप में स्वीकारती हूँ….

मुझे ‘सामान’ रूपी ‘शरीर’ का ‘सम्मान’ नहीं बल्कि ‘स्वाभिमान’ चाहिए । यदि मैं कम वस्त्रों में दिखूं तो तुम्हारे भीतर वासना जग जाती है , क्या मां के स्तनों से लिपट कर दूध नहीं पिया है तुमने? अच्छा छोड़ो मैं खुद को पूर्णतः ढक लुंगी..किन्तु 9 माह की उम्र में क्या पहनू की तुम्हारी वासना वहां न जागे ? तुम ‘पुरुष प्रधान’ हो , लेकिन क्या हमारी कोई जगह नहीं ? क्या स्त्रियां बस मानव की प्रजाति में सामंजस्य के लिए है ?स्त्रियों को ‘परंपरा और विचारों’ में कैद करने की कोई अवधारणा वेद या पुराणों में दी गई है?? तुम कौन सा इतिहास, वेद और पुराण पढ़े हो ? जरा साक्ष्य बताओ…..मंदोदरी हो या मरियम, कुंती हो या गांधारी….या फिर तुम्हारे दरिंदगी का शिकार हुई ‘दामिनी’…सभी स्वयं में ‘पूर्ण’ है। क्या समाज को दिशा देने और सभ्य बनाने की जिम्मेदारी बस स्त्रियों की है ,अगर ऐसा है भी तो शुक्रिया.. हमे इतना जिम्मेदार बनाने और समझने के लिए। हम स्त्रियां कमजोर न कल थी न आज है, हम बस स्वयं को ‘सीमित’ रखती हैं। क्योंकि इतिहास गवाह है जब जब स्त्रियों ने शोषण से आहत होकर ‘हथियार’ उठाया है ब्रम्हांड के किसी पुरुष में उसे रोकने की ‘ताकत’ नहीं रही। चाहे ‘दुर्गा’ हो या दस्यु सुंदरी ‘फूलन’ जब भी हथियार उठा है राक्षसों का सर्वनाश हुआ है। अतः स्त्रियों को सशक्तिकरण की आवश्यकता नहीं बल्कि पुरुषों को ‘शुद्धिकरण’ की आवश्यकता है। तुम जो बार बार ‘उपमा’, ‘उपमेय’, और ‘उपमान’ का खेल हमारे साथ खेलते हो न यकीन मानो वहां जीत के साथ हार भी तुम्हारी होती है। मेरे हाथों में तो आगाज़ से ही वेद, तलवार, मुद्रा और आशीर्वाद रहा है हम कभी अबला नहीं रही। किन्तु जो तुम्हे मेरे साथ कदम मिला कर चलने में परेशानी होती है ना ये तुम्हारी ‘हीनता’ है। ‘स्त्री और पुष्प ‘ सुंदरता और कोमलता के द्योत्तक हैं । अंततः इतना ही कहूँगी तुम चाहो हमसे प्रेम करो या हमारा तिरस्कार हमे फर्क नही पड़ता, किन्तु हमें चंडी रूप के लिए बस मजबूर न करो। हममें दुर्गा के त्रिशूल की भी शक्ति है और सरस्वती सी सादगी भी है। तुम हमे लक्ष्मी के रूप में चाहते हो तो खुद में ‘विष्णु’ की छवि बनाओ। अन्यथा सशक्त हम कल भी थीं और आज भी है। ‘कलम’ की ताकत से लेकर ‘कृपाण और कटारी’ की ताकत भी हममे समाहित है। हम स्त्री आदि काल से अनंत तक स्वयं मे पूर्ण हैं और आशा करती हैं कि तुम भी स्वयं का आकलन कर पाओगे।
तुम्हारी
आईना
…….’एक स्त्री’

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