जब संत व्यापारी हो जाए तो सवाल उठेंगे ही

– अनिल द्विवेदी, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार

योग गुरू बाबा रामदेव जी पर मेरी गहरी आस्था है इसलिए नही कि वे हिन्दु—संत हैं, गोयाकि देश—दुनिया में भारतीय योग और स्वदेशी का ब्राण्ड बन चुके हैं. बाजार पतंजलि के उत्पादों से इस कदर भर गया है कि हिंदुस्तान लिवर जैसी कंपनियों के छकके छूट गए हैं। बाबा की आलोचना को भी मैं दरकिनार करता आया हूं तो इसीलिए क्योंकि दुनिया की नजरों से तो भगवान भी नही बच सके थे, बाबा रामदेव तो महज एक इंसान हैं।

लेकिन इस भरोसे पर तब कुठाराघात हुआ जब खबर आई कि योग.गुरु से महज एक सवाल पूछने के आरोप में देश के ख्यातलब्ध पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी की नौकरी चली गई. हो सकता है यह महज कयास भर हो. क्योंकि प्रसूनजी ने अपने इस्तीफे में ऐसी कोई वजह नही लिखी और न ही उनके मीडिया हाउस ने कोई स्पष्टीकरण दिया है. पर कुहांसे के जो बादल देश के आम मन में कुछ सालों से घिर आए हैं, उसी के मुताबिक इंटरव्यू में बाबा रामदेव से यह सवाल हुआ कि आपने टैक्स बचाने के लिए ट्रस्ट बना लिया..? सवाल सही था इसलिए वैसे ही जवाब की उम्मीद भी थी लेकिन जब प्रसूनजी ने सवाल के साथ यह जोड दिया कि स्वदेशी की बात करने वाले बाबा महंगी कार और चार्टर प्लेन में घूमते हैं, तब योग—गुरू उखड गए, फिर भी पतंजलि ग्रुप के जनक ने ऐसी लम्बी सफाई दी कि आरोप बेसिर—पैर का लगने लगा!

हालांकि प्रसून जी ने वही सवाल उठाया था जो बाबा के लाखों प्रशंसक या आलोचकों के मन में यदा—कदा घुमडता रहता है. किसी संत का आश्रम जब कार्पोरेट घराने में तब्दील हो जाए या 11 हजार करोड चैरिटी में खर्च कर रहा हो, उससे इसकी सफाई मांगने या देने में क्या हर्ज होना चाहिए भला. वैसे योग.गुरु ने जो सफाई दी, उसने ऐसे आरोप की धज्जियां उड़ाकर रख दी। लेकिन बात बिगडती चली गई. दरअसल पत्रकारिता को बाजार के अधीन करने या मान लेने का जो षड्यंत्र पैर पसार रहा है, ताज़ा विवाद भी इसी की उपज है.

प्रसूनजी तो आज के शिकार हैं, नवभारत रायपुर के संपादक स्वर्गीय बबन प्रसाद मिश्र को महज इसलिए इस्तीफा देना पडा था क्योंकि उन्होंने फ्रण्ट पेज पर ब्राम्ही आंवल केश तेल का विज्ञापन देने का विरोध किया था. तब मैं ट्रेनी हुआ करता था। मिश्रजी का मानना था कि पहले पेज पर खबरों का अधिकार बनता है, विज्ञापन का बाद में. सबसे तेज चैनल होने का दावा करने वाले न्यूज चैनल आजतक को पतंजलि ग्रुप करोडों के विज्ञापन देता है इसलिए दबाव तो आना ही था. प्रबंधन ने पहले प्रसूनजी के प्राइम टाहम बुलेटिन 10तक को छोटा किया और उसके बाद बाजपेईजी ने सीधे इस्तीफा ही सौंप दिया. सुना है कि शवासन करने से मन चित्त और शांत रहता है, गुस्सा नही आता, फिर बाबा रामदेव दुर्वासा श्रृषि क्यों बन गए. संत तो बडे उदार दिल के होते हैं. सिर्फ एक सवाल पूछनेभर से यदि संतत्व काफूर हो रहा है तो यह समझना आसान है कि योगत्व कितना प्रभावकारी होता है..!

रवीश कुमार जी ने कभी कहा था कि जिस लोकतंत्र में सवाल पूछना मना हो जाए, वह मरने लगता है. यहां मैं एनडीटीवी मीडिया हाउस के दृष्टिकोण की तारीफ करना चाहूंगा जिसने सरकारी—तोप से डरे बगैर, टीआरपी में सबसे नीचे गिर जाने के बावजूद रवीशजी की नौकरी नही खाई और उन पर भरोसा बनाये रखा हुआ है. एनडीटीवी से मेरे वैचारिक मतभेद हैं, बावजूद इसके मुझे यह चैनल सबसे ज्यादा पसंद है क्योंकि यहां सवाल उठाने की आजादी है, जनसरोकारों से जुडा चैनल लगता है.

एक दौर 1975 में इमरजेंसी का था. मीडिया—घरानों में सरकारी—अफसर पत्रकार बनकर बैठे हुए थे. तब बीबीसी का एक इंटरव्यू प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ तय हुआ. यह पहला मौका था जब गूंगी गुडिया——लोहिया जी ने इंदिरा गांधी को यही नाम दिया था——मीडिया के सवालों का जवाब देने आ रही थीं. पीएम निवास पर बीबीसी की टीम तैयार थी. अचानक इंदिराजी आईं और गुस्से में बोलीं, आपको यहां किसने बुलाया..आप जा सकते हैं.! बाद में मार्क टुली ने अपनी एक पुस्तक में खुलासा किया कि इंदिराजी बीबीसी के कई सवाल खडे करने से नाराज थीं लेकिन हमने सिर्फ अपना फर्ज अता किया था क्योंकि देश उनसे कई सवालों के जवाब मांग रहा था.

तो चाहे मार्क टुली रहे हों, चाहे वो रवीश जी हों, प्रसून जी हों या बस्तर के सांई रेडडी, सवाल आज भी जिंदा हैं और उसे पूछने वाले पत्रकार भी. सत्ता के सामने जो झुके हैं या रेंग रहे हैं, वे पत्रकार नही हैं. कल शाम को ही मैं सरकार के एक केबिनेट स्तर के नेता के साथ था. फोन पर एक पत्रकार से बतिया रहे थे. पत्रकार एक ही सवाल बार.बार पूछ रहा था. अंततः नेता जी ने भददी सी गाली देते हुए फोन काट दिया. फिर मेरी ओर मुखातिब होते हुए बोले, अब आप जैसे लोग मीडिया छोडेंगे तो ऐसे ही चिरकुट राज करेंगे. बात अंदर तक हिला गई थी लेकिन मन खदबदा रहा है कि सवाल पूछना इतना बुरा क्यों लगता है..!

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