शाब्दिक बेहयाई और संसद की लक्षमणरेखा

साँच कहै ता…जयराम शुक्ल

ये अजीब इत्तेफाक है, जिस दिन कैलीफोर्निया की 78 वर्षीय डेमोक्रेट नैंसी पेलोसी अमेरिकी सदन में अपने आठ घंटे के लंबे प्रभावी भाषण के जरिए संसदीय इतिहास रच रहीं थी उसी दिन भारत के सदन में सांसद रेणुका चौधरी अपने अट्टहासों के जरिए संसदीय गरिमा पर चार चांद लगा रहीं थीं।

अब तमाम जरूरी मुद्दों के ऊपर इस अट्टहास की ध्वनि-प्रतिध्वनि गूँज रही है और हमारे मीडिया का प्राईम टाईम डिबेट इसी को लेकर मगन है। एक बौद्धिक वर्ग इस अट्टहास पर की गई प्रधानमंत्री की टिप्पणी को नारी अस्मिता पर प्रहार साबित करने पर तुला है।

पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों ही शाब्दिक बेहयाई पर उतर चुके हैं। सोशल मीडिया में ट्रोलर और प्रपोलर दोनों ही भिड़े हैं। फोटोशापट्रिक और कटपेस्ट के कमालची रेणुका के सिर पर सींग और कटी नाक दिखाकर सूर्पनखा बता रहे हैं तो उन्हीं में से कोई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को महिषासुर चित्रित कर रहा है। समूची दुनिया हमारे देश का यह संसदीय तमाशा देखकर मजा ले रही है।

ये सब देखके खुद का सिर धुनने को जी करता है। उस दिन के घटनाक्रम का वीडियोक्लिप देखने को मिला। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राज्यसभा में बोल रहे थे। वे बता रहे थे आधार का आयडिया अटलबिहारी वाजपेईजी का था जिन्होंने नेशनल आइडेंटी कार्ड की बात की थी। यही आज का यूनिक आईडेंटी नंबर है जिसे आधार कहते हैं।

यह वाक्य पूरा ही नहीं कर पाए कि लगातार अट्टहास का स्वर सुनाई देता है। कैमरा समझाइश देते सभापति वेंकैय्या नायडू और मोदी पर फोकस रहता है। सभापति इस अट्टहास पर कोई हिदायद देते इससे पहले ही मोदी ने कह दिया कि सभापतिजी रेणुका चौधरी को कुछ मत कहिए रामायण सीरियल के लंबे अर्से बाद ऐसी हँसी सुनने को मिल रही है। वीडियो में यह भी दिखता है कि इस प्रतिटिप्पणी के बाद समूचे सदन में ठहाके गूँजे और इसमें सभी दलों के सदस्य मजा लेते हुए दिखाई देते हैं,कांग्रेस के भी।

इसके कुछ घंटों के बाद ही रामायण की हँसी की व्याख्या शुरू हो जाती है। पहले तो इस अट्टहास को रावण से जोड़ा गया। फिर सूर्पनखा से। इसी बीच गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू के सोशल एकाउंट से पंचवटी का वह दृश्य जारी हो गया जो सूर्पनखा के नाक कान काटे जाने का था। भाजपा का आईटी सेल और आगे निकला उसने रामायण की सूर्पनखा बनी पात्र के साथ रेणुका चौधरी की तुलना कर दी।

सदन में जो वाकयात था उसका सूर्नपखा सीता प्रसंग से कोई लेना देना नहीं था। वैसे रामायण में हँसी ठहाके का एक प्रसंग जनकपुर में सीता-राम के विवाह के समय का भी है जिसमें मजाक और हँसी ठट्टे लगते हैं। पर इधर किसी का विचार ही नहीं गया। जाए भी कैसे हमारी राजनीति और मीडिया का दिमाग फुल आफ निगेटिविटी की लुगदी से भरा है। अब तो कमाल यह कि किरण रिजीजू से भी ज्यादा तेज स्वरों में काँग्रेस साँसद चिल्ला रही हैं कि उन्हें सूर्नपखा कहा गया। जो नारी सम्मान पर मोदी की सत्ता का प्रहार है।

दरअसल सही पूछें तो आज की तारीख में सबसे ज्यादा यदि कोई खुश होगा तो वो रेणुका चौधरी ही होंगी। पहले टीडीपी और अब कांग्रेस में उनकी इसी “बिंदास” वैल्यू की वजह से खास स्थान है।
सदन में बैठेठाले उनकी इतनी चर्चा हो गयी यह तो मुँह माँगी मुराद जैसी बात है। काँग्रेस के नए बाँस को रिझाने का इससे अच्छा अवसर और हो भी क्या सकता है।

देश में जब से 24गुणे7 वाले चैनलिया मीडिया की होड़ शुरू हुई तब से राजनीति में इसी तरह के गैरजरूरी घटनाक्रम बहस के मुख्य केंद्र में आने लगे हैं।

नेता हरहाल चर्चाओं में रहना चाहता है, चाहे उसे कुछ भी जोकरई करना पड़े। मीडिया की खबर वही हो सकती है जो मसालेदार हो, विवाद पैदा करे। सीधे सच्चे वक्तव्यों के लिए कोई गुंजाइश नहीं। इसलिये इन माननीयों के मुँह से प्रायः वही झरने लगा जो सनसनी घोले, बहस और विवाद को आगे बढाए।

रेणुका चौधरी का अट्टहास इसी दिशा में एक सफल प्रयास साबित हुआ। इसकी सफलता पर चार चांद किरण रिजीजू समेत उन लोगों ने लगाया जिन्होंने इसे सूर्पनखा प्रसंग के साथ जोड़ा।

साफ बात तो यह है कि किसीको इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि संसद में उनकी कही-सुनी बातों को पब्लिक संजीदगी से लेती है। आमराय जानने की कोशिश करिए तो पता चलेगा कि लोकतंत्र के इस पवित्र मंदिर को अब लोग मसखरों के ऐसे अड्डे के रूप में देखने लगी है जहाँ हमारे कर्णधार सिर्फ़ और सिर्फ वायदों का वकवाद करते हैं, कहे से मुकर जाते हैं, आरोप लगाते हैं और अंडरटेबिल समझौते कर लेते हैं, सदन में अभिव्यक्ति के विशेषाधिकार की आड़ में मसखरी और हंगामे करके सदन ठप्प कर देते हैं।

जनता से टैक्स के जरिए वसूले गए करोड़ों-करोड़ रुपए संसद में बिना कामकाज हुए हंगामे में फुँक जाते हैं। और हाँ जब भी सांसदों के वेतन,भत्ते,सुविधाओं की बात आती है तो सारा बैर-विरोध भूलकर एक हो जाते हैं। देश की जनता मँहगाई से कराहती है और वे सेंट्रल हाल की कैंटीन में सब्सिडी की चिकन बारियानी उड़ाते हैं।

दिल्ली की सत्ता के गलियारों में यह सब जानते हैं कि ओवैसी की हैदराबादी बिरियानी जितनी काँग्रेसियों को लिज्जतदार लगती है उससे कम लजीज भाजपाइयों को नहीं। विजय माल्या जब तक राज्यसभा में थे उनके “गिफ्ट” का इंतजार बहुतों को हुआ करता था। राजनीति के रसूखदारों के बीच एक तरह से राँयल लिकर सप्लायर के तौरपर ही विख्यात थे।

पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच एक अच्छी अंडरस्टैंडिंग होती है जिसे पब्लिक न समझ पाती और न देख पाती। रेणुका चौधरी-अट्टहास प्रकरण अभी कुछ दिन खिंचेगा लेकिन काँग्रेस यह मानकर चले कि यह नारी अस्मिता से जुड़ा मसला है तो वह मुगालते में है क्योंकि देश की जनता ने अपने प्रधानमन्त्री के भाषण के बीच उस कर्कश अट्टहास की गूँज सुनी है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इतनी भी इजाजत नहीं देती कि दूसरे की अभिव्यक्ति पर इस फूहड़ तरीके से अतिक्रमण किया जाए चाहे वह विशेषाधिकार के कवच से घिरा संसद भवन ही क्यों न हो।

1977 में मैं जब स्कूल का विद्यार्थी था तब पहली बार संसद की कार्यवाही देखी। यमुना प्रसाद शास्त्री जी तब हमारे सांसद थे। दर्शक दीर्घा में जो दिव्य अनुभूति हुई थी उसका बयान शब्दों में नहीं किया जा सकता। तब यह कल्पना करता था कि पँ. नेहरू, सरदार पटेल,अंबेडकर साहब, लोहियाजी, गोपालन साहब, श्यामाप्रसाद मुखर्जी,अटलजी,चंद्रशेखर,मधुलिमये, मधु दंडवते और न जाने कितने दिव्य व्यक्तित्व वाले राजपुरुष इस सदन की कितनी शोभा बढ़ाते रहे हैं। बताते हैं कि मधुलिमये जब धीमी आवाज में सदन को अपने तथ्यों व तर्कों से चकित करते थे तो समूचा सदन सन्नाटे में रहता था। इस टीवी युग में चंद्रशेखरजी जैसे लोग जो अपनी पार्टी में वर्षों एकल नेता थे बोलते थे तो सभी सम्मान के साथ एक एक शब्द सुनते थे।

अपने मध्यप्रदेश की विधानसभा की भी सुदीर्घ परंपरा रही है कि अच्छे वक्ता को पार्टी लाईन से ऊपर समूचा सदन सुनता था। और यह एक मर्यादाजनित परंपरा हैं कि जब सदन का नेता, प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री या नेता प्रतिपक्ष बोलने के लिए खड़ा होता है तो बिना टोकाटाकी सभी धैर्यपूर्वक उसे सुनते हैं।

संसद में जब देश का प्रधानमन्त्री बोल रहा हो तो उस बीच अनायास गैरजरूरी अट्टहास अभिव्यक्ति पर जबरिया अतिक्रमण है, इसकी उम्मीद कोई नहीं करता।

मैं इस पूरे घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूँ उस अट्टहास के स्वर को भी और उसकी सूर्पनखा से तुलना को भी। जब हम हर सबक अमेरिका से ही लेने लगे हैं तो अमेरिकन डेमोक्रेट नैंसी पेलोसी से क्यों न लें?

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