हरसूद डूब रहा था…उमा भारती ने कहा- इतना नहीं सोचा करते !

बहुत दिनों से ठंडी पडी नर्मदा की घाटी फिर सुलग रही है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेघा पाटकर अपने ग्यारह साथियो के साथ धार जिले के चिखल्दा गांव में नर्मदा किनारे अनशन पर बैठी हैं। जीने दो हमें गांव में रहने दो, के नारे बडवानी और धार जिले के आदिवासी गांवों में गूंज रहे हैं। डेड लाइन सर पर है और सरकारी अमला परेशान है कि कैसे इन हजारों गांव वालों को डूब क्षेत्र से हटाकर विस्थापन के टीन तंबुओं तक लायें।
उधर गांवों में पानी का जल स्तर लगातार बढ रहा है। शनिवार की दोपहर तक ये पानी 121 मीटर था जबकि खतरे का निशान ये 123 फीट पर है। उधर देश दुनिया से आंदोलनकारियों से अनशन खत्म करने की अपीलें हो रहीं हैं मगर अनशनकारी टस से मस नहीं हो रहे। वो समझते हैं कि यदि अनशन टूट गया तो उनके हाथ कुछ भी रह नहीं जायेगा।
कुछ साल पलट कर देखते हैं तो याद आते हैं सागर विश्ववविघालय के साल 1989 के वो दिन जब पत्रकारिता की पढाई के दौरान नर्मदा सागर परियोजना से ऐसे ही हरसूद कस्बे की डूब की खबरें चर्चा में थी जैसे आज सरदार सरोवर परियोजना से निसरपुर कस्बे की डूब की बातें हो रहीं हैं। पत्रकारिता की पढाई में नया नया ही था कि हमारे शिक्षक प्रदीप कृष्णात्रे ने मुझे कक्षा से ही सीधे हरसूद भेज दिया था 28 सितंबर 1989 को हरसूद में होने वाली रैली की तैयारियों की जानकारी लेने। वो मेरा पत्रकारिता का पहला पाठ था किसी तरह तलाशते और पूछते हुये हरसूद पहुंचा और वहां तैयारियों की बैठक में शिरकत की जिसमें मैंने पहली बार मेघा पाटकर को देखा और राकेश दीवान से भी मिला। हरसूद से लौटते में मैं बहुत सारे पोस्टर लाया था जिनमें नर्मदा परियोजना के विरोध के साथ ही बडे पैमाने पर विस्थापन और पुनर्वास पर सवाल उठाये गये थे। सागर विश्वविघालय की लाइब्रेरी के पास हमने तकरीबन दो दिन इन पोस्टरों की प्रदर्शनी लगायी थी जो पूरे विश्वविधालय में चर्चा का विपय रही। सवाल उठे कि पत्रकारिता के छात्रों को विभाग में बैठकर पढना चाहिये या फिर सरकार विरोधी आंदोलनकारियों का साथ इस तरह सडक पर उतर कर देना चाहिये। मगर तमाम तरह के विरोध के बाद भी हमारे विभाग के शिक्षकों ने हम छात्रों की इस पहल को सराहा और 28 सितंबर को हम सब पत्रकारिता विभाग के बीस छात्र हरसूद की उस ऐतिहासिक रैली में थे जिसमें मेघा पाटकर और बाबा आम्टे के साथ कांग्रेस से निष्कासित ओर वीपी सिहं के साथी वीसी शुक्ला, मेनका गांधी, स्वामी अग्निवेश और शरद यादव आये हुये थे। तब पचास हजार की भीड के बीच नारे लगे थे कोई नहीं हटेगा बांध नहीं बनेगा।
आजादी के बाद पहली बार इतने बडे स्तर पर विकास परियोजना से होने वाले कथित विकास पर सवाल उठे थे। पूछा गया था कि किसका विकास किसकी कीमत पर। क्या शहर का विकास गांव की कीमत पर। बांध से होने वाले विकास के नाम पर कब तक जंगल और जमीन डुबेगे। कब तक भला किसानों और आदिवासियों को उनके जंगल और जमीन से खदेडोगे। ये सवाल इस सम्मेलन में प्रमुखता से उठे थे और कई सालों तक ये सवाल नर्मदा घाटी में गूंजते भी रहे।
इस सम्मेलन की याद में हरसूद में स्मृति स्तंभ भी लगा था जो विस्थापन का विरोध करने वालों को ताकत देता था। मगर तमाम विरोध प्रदर्शनों और अनशन के बीच नर्मदा में पानी बहता रहा और आ गयी 31 जून 2004 की वो डेडलाइन जब हरसूद का नाम सरकारी दस्तावेजो से हटा दिया गया। हरसूद के डूब के पहले स्टार न्यूज के लिये हम डेरा डालकर खंडवा में थे और रोज सुबह से रात तक अपनी ओवी वैन के साथ हरसूद के विस्थापन से जुडी मार्मिक कहानियां तलाशते थे। विस्थापन का दर्द क्या होता है बडे करीब से महसूस किया। अपने बनाये घर को अपने हाथों से तोडना क्या होता है। अपने शहर को डूबते देखना कितना दुखद होता है।
हम मानते हैं कि इमोशन टीवी की सबसे बडी खबर होती है और हरसूद के हर रहवासी के आगे माइक लगाते ही उसकी आंखों से आंसू बह निकलते थे। टीवी की परफेक्ट कहानी होती थी मगर कैमरा बंद होते ही हम भी उस दर्द में भीग चुके होते थे।

 

प्रदेश में तब उमा भारती सरकार भारी बहुमत से आयी थी और नये नवेले मंत्रियों पर गांव कस्बा खाली कराने की जिम्मेदारी आ गयी थी। कैलाश विजयवर्गीय, विजय शाह और अनूप मिश्रा के रोज दौरे होते थे हरसूद। उसी दरम्यान एक मंत्री ने मुझसे कहा भी कि यार मैंने तो उमा जी से कह दिया है दीदी हम बहुत पाप का काम कर रहे हैं। तब उमाजी ने मुझे बडे प्यार से पास बुलाया और मेरे बालों पर हाथ फेरकर कहा इतना नहीं सोचा करते।

आज हरसूद नहीं है कल निसरपुर भी नहीं रहेगा। हरसूद को डुबोने वाले नर्मदा सागर बांध को देखने लोग पुनासा आते हैं और बाँध की भव्यता और नर्मदा की विशाल जलराशि की में खो जाते है। याद नहीं आते ढाई सौ गांव और 25 हजार की आबादी वाला हरसूद। गुजरात के नवागांम में भी लोग जब सरदार सरोवर देखेंगे तो एमपी के सैंकडों गांव और निरसपुर कस्बे के लोगों के आंसू वहां नहीं दिखेगे।

उधर चिखल्दा में अनशनकारियों के अनशन को तोडने की कोशिशें जारी हैं मगर ये अनशन खतरे के निशान तक आते पानी को रोक पायेगा लगता नहीं। दुख इस बात का है कि हरसूद की डूब के वक्त देश भर में बहस छिडी हुई थी बडी परियोजनाओं की जरूरत पर मगर अब डूब विस्थापन और अनशन खबरों से गायब है।

 

-ब्रजेश राजपूत,एबीपी न्यूज,भोपाल

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