सरस्वती पूजन के साथ वसंत ऋतु का आगमन

img1140129074_2_1

भोपालः सरस्वती पूजन वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है. ऋतुओं के राजा के कहे जाने वाले वसंत में प्रकृति की अनुपम छठा नजर आती है. वृक्षों से पुराने पत्ते झड़ कर उनमें नयी कोपलें प्रस्फुटित होने लगती हैं. दूर-दूर तक फैले खेतों में सरसों के वासंती फूलों की छटा देखते ही बनती है. प्रकृति मानो नये साजो-श्रृंगार के साथ इस ऋतु का स्वागत करती है. माघ महीने की शुक्ल पंचमी को वसंत पंचमी मनाई जाती है. इसी दिन से वसंत ऋतु की शुरुआत होती है. साथ ही, इस दिन को मां सरस्वती के जन्म से जोड़ा जाता है और उनकी विधिवत पूजा की जाती है. मां सरस्वती को ज्ञान, बुद्धि, कला और कौशल की देवी माना जाता है. यही वजह है ज्ञान के पिपासु लोग मां सरस्वती का आशीर्वाद पाने के लिए उनकी वंदना करते हैं. भारतीय जीवन में परिवर्तन का मनुष्य ने जिस उत्साह के साथ स्वागत किया वहीं त्योहारों के रूप में परंपरा में शामिल होता गया. बसंत पंचमी ऋतुओं के उसी सुखद परिवर्तन का स्वागत समारोह है. धार्मिक रूप से यह त्योहार हालांकि विद्या की देवी सरस्वती की पूजा से संबंधित है. संपूर्ण भारत में बड़े उल्लास बसंत पंचमी के रोज विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है. बसंत पंचमी के पर्व से ही बसंत ऋतु का आगमन माना जाता है. बसंत पंचमी का अर्थ है शुक्ल पक्ष का पांचवां दिन अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार यह पर्व जनवरी-फरवरी तथा हिन्दू तिथि के अनुसार माघ के महीने में मनाया जाता है. दरअसल मौसम और प्रकृति में मनोहारी बदलाव होते जिसने मनुष्य को सदा से उल्लासित किया है. पेड़ों पर फूल आ जाते हैं. नई कोपलें निकल आती हैं. फलों के पेड़ों में बौर आने का संकेत मिल जाता है. इन श्रंगारीक परिवर्तनों ने कवियों को सदैव आकर्षित किया और वसंत कविता का विषय रहा. प्राय: हर भाषा के कवि ने बसंत का अपनी तरह से वर्णन किया है. बसंत पर्व का आरंभ बसंत पंचमी से होता है. इसी दिन श्री अर्थात विद्या की अधिष्ठात्री देवी महासरस्वती का जन्मदिन मनाया जाता है. माघ महीने की शुक्ल पंचमी को वसंत पंचमी मनाई जाती है. इसी दिन से वसंत ऋतु की शुरुआत होती है. साथ ही, इस दिन को मां सरस्वती के जन्म से जोड़ा जाता है और उनकी विधिवत पूजा की जाती है. मां सरस्वती को ज्ञान, बुद्धि, कला और कौशल की देवी माना जाता है. यही वजह है ज्ञान के पिपासु लोग मां सरस्वती का आशीर्वाद पाने के लिए उनकी वंदना करते हैं. श्वेत वस्त्रों में मां सरस्वती बेहद आकर्षक और तेजस्वी नजर आती हैं. उनका प्रिय रंग श्वेत है जो सात्विकता, सहजता और सरलता का प्रतीक है. पुराणों में मां सरस्वती के अनेक रूपों की चर्चा की गई है. इनके जन्म के बारे में भी अनेक मत मौजूद हैं. एक मत के अनुसार, देवी सरस्वती का जन्म स्वयं ईश्वर के मुख से हुआ है. इसलिए इनका नाम ‘वाणी’ भी है. एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, सरस्वती का जन्म पार्वती के शरीर कोष से हुआ, इसी वजह से उनका एक नाम ‘कौशिकी’ भी पड़ा. देवी भागवत के अनुसार, सरस्वती का जन्म श्रीकृष्ण की जिह्वा से हुआ और उन्होंने ही सरस्वती पूजन को प्रचलित किया. प्राचीन संस्कृत साहित्य में सरस्वती का ब्रह्मा जी से विशेष संबंध दर्शाया गया है. कहा जाता है कि सरस्वती ब्रह्मा जी के मुख से उत्पन्न हुई थीं इसीलिए उन्हें ‘वाग्देवी’ भी कहा जाता है. मां सरस्वती हमें विद्या और ज्ञान अर्जित करने के अलावा और भी कई महत्वपूर्ण संकेत देती हैं. देवी सरस्वती के संपूर्ण आभा मंडल से हमें जीवन पथ पर सफलता पाने के अनेक संकेत मिलते हैं (श्वेत वस्त्र) देवी सरस्वती के श्वेत वस्त्रों से हमें दो संकेत मिलते हैं. पहला, हमारा ज्ञान निर्मल हो. हमें जो भी शिक्षा और ज्ञान मिले वह सकारात्मक हो. दूसरा, हमारा चरित्र अच्छा हो. हमारे जीवन में किसी भी प्रकार की बुराई न हो. बसंत को ऋतुओं का राजा अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है. इस समय पंचतत्त्व अपना प्रकोप छोड़कर सुहावने रूप में प्रकट होते हैं. पंचतत्त्व, जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक रूप दिखाते हैं. दरअसल मौसम और प्रकृति में मनोहारी बदलाव होते जिसने मनुष्य को सदा से उल्लासित किया है. पेड़ों पर फूल आ जाते हैं. नई कोपलें निकल आती हैं. फलों के पेड़ों में बौर आने का संकेत मिल जाता है. इन श्रंगारीक परिवर्तनों ने कवियों को सदैव आकर्षित किया और वसंत कविता का विषय रहा. प्राय: हर भाषा के कवि ने बसंत का अपनी तरह से वर्णन किया है. बसंत पर्व का आरंभ बसंत पंचमी से होता है.

3 Responses so far.

  1. FYI: I tried out duplicating typically the BlogWealthMaker web link and also Tendency Micro blocked it as a malevolent website and so be careful!

  2. Bobbo says:

    Superior thinking deomnstrated above. Thanks!

Leave a Reply

%d bloggers like this: