“सरकार और शख्सियत को उठाने और गिराने वाला नहीं है मीडिया”

सुबह सवेरे, (ग्राउंड रिपोर्ट)

वैसे जबलपुर मैं गया तो भाई की शादी में शामिल होने था मगर रात को रिसेप्शन में ही अगले दिन सुबह पत्रकारो के लिये जबलपुर विश्वविघालय की ओर से कराये जा रहे योग शिविर के उद्घाटन सत्र में आने का न्यौता मिल गया। सोचा इस बहाने जबलपुर के साथी पत्रकारों से एक साथ वक्त बिताने का मौका मिल जायेगा। बस फिर क्या था अगले दिन सुबह बुलाये गये गणमान्य अतिथियों के साथ अपन मंच पर थे।

मगर उस आयोजन में पत्रकारीय पेशे से जुडे काम के तनाव, बेतहाशा भागादौडी और वक्त की तंगी के साथ जो बात कहकर उपस्थित पत्रकारों का सीना फुलाया जा रहा था वो ये कि ये वो पेशा है जो लोगों को उठाता और गिराता है। लोगों की जिंदगी बनाता और बिगाडता है। तकरीबन मंच से संबोधित करने वाला हर शख्स ये बात जरूर दोहरा रहा था। मुझसे रहा नहीं गया और मैंने सामने बैठे लोगों से पूछ ही लिया क्या आप किसी को उठाने और गिराने के लिये ही खबरें करते हों। जबाव नही में था।

वाकई ये सच भी है। पत्रकारिता के पेशे में हम खबरें ही करते हैं मगर अधिकतर खबरों के पीछे कुछ छिपा मंतव्य अक्सर नहीं होता। हर खबर किसी का भला तो किसा का बुरा करतीं हैं। जिसको खबर अच्छी लगी वो खुश होते हैं तो जिसको खबर बुरी लगी तो वो नाराज। मजे की बात ये है कि खुश रहने वाले भी ज्यादा समय तक खुश नहीं रहते। क्योकि कुछ दिनों में ही उनको नापसंद आने वाली खबर भी हम कर ही देते हैं। वैसे भी किसी को खुश रखना हमारा पेशा नहीं है। मुझे कहना पडा कि मंच से कहीं गयी बातें हमें खुश करने के लिये बोली जा रहीं हैं मगर हमें ये गलतफहमी नहीं है कि हम पत्रकार लोगों को चढाते ओर गिराते हैं बल्कि व्यक्ति अपने कर्मो से उपर चढता और अपने कर्मो से ही नीचे गिरता है।

हम तो सिर्फ खबर छापने और दिखाने वाले हैं, यानिकी समाज में जो घट रहा है उसका ब्यौरा देने वाले लोग हैं हम, दूसरे शब्दों में कहें तो समाज का आईना है पत्रकारिता। समाज में जो घट रहा है उसे बताते हैं हम। सच्चाई बताते हैं और ये सच्चाई इतनी कडवी होती है कि जिसे सहना हर किसी के बस में नहीं होता। आमतौर पर आंदोलनकारी पहले हम मीडिया को बुलाकर अपना दुखडा रोते हैं फिर उग्र होने पर मीडिया पर ही प्रहार करते हैं उसी जगह मौके पर मौजूद पुलिस भी चाहती है हम जो हिंसा हो रही है वह ना दिखाये, उधर प्रशासन और सरकार भी चाहती है जो घट रहा है उसे प्रकाशित नहीं किया जाये मगर मीडिया है कि हर ओर से दुश्मनी मोल लेकर जो होता है उसे दिखाते और छापते हैं।
किसान आंदोलन के दौरान मंदसौर के पीपल्या मंडी में मुझ पर हमलावर भीड इस वजह से नाराज थी कि गोलीकांड के बाद क्यों आये हो पहले आते तो गोलियां नहीं चलतीं हमारे लोग नहीं मारे जाते, उनकी धमकियां झेलते हुये मैं ये नही कह पा रहा था कि भाई हिंसा नहीं होती तो गोलियां भी नही चलतीं उनको इस बात पर भी ऐतराज था कि टीवी पर किसानों को उपद्रवी और हिंसक क्यों लिखा जा रहा था और इस नाराजगी को वो मुझ पर उतारना चाहते थे मगर मैं भागते हुये ये भी नहीं कह पा रहा था कि हाईवे पर पथराव करोगे और ढेरों गाडियों को आग के हवाले करोगे तो हम मीडिया तुमको उपद्रवी ही कहेंगे, हम नेता नहीं है जो तुमको खुश करने के लिये कहें कि आग लगाने वाले किसान नहीं तस्कर हैं । उधर पुलिस हमसे कह रही थी कि आप यहां से जाओ तो फिर हम इन उपद्रवियों से जरा सख्ती से निपटें। आप रहोगे ओर कैमरे में कैद करोगे तो ये पुलिस प्रशासन के खिलाफ जायेगा।
मगर ये क्या ग्राउंड रिपोर्ट में किस्सा सुनाते सुनाते भला पत्रकारिता पर इतनी सारी बातें क्यों। दरअसल हमारे एमपी में हुये किसान आंदोलन और उस दौरान की गयी रिपोर्टिंग के चरचे अब तक सुनायी दे रहे हैं। किसानों पर चली गोलियां और उसके बाद सरकार के घडियाली आंसुओं की रिपोर्टिंग तो सभी ने की मगर हमारे चैनल एबीपी न्यूज ने जिस तरह से इस मुददे को आक्रामकता और सच्चाई के साथ दिखाया वो लोग याद रखे हुये हैं और मिलने पर बडी देर तक चैनल के रवैये और खबरों की चरचा करते हैं। कुछ समझते हैं चैनल सरकार के पीछे पड गया है तो कुछ लोग चैनल की सरकार से नाराजगी के मायने तलाशते हैं मगर सच ये है कि ये चैनल और समाचार माध्यम का काम है कि जब जनता से जुडी बडी खबर आयेगी तो बडे अंदाज में ही चलायी जायेगी और उस दौरान उन खबरों में एजेडा तलाशना बेकार है। अचानक ही हमारे चैनल की टीआरपी आम जनता के चरचा के मीटर पर बढ गयी है।

सरकार की अलोकप्रियता ओर उस पर चैनल की आक्रामक रिपोर्टिंग पसंद की गयी। मगर ये सब भी किसी को गिराने और चढाने के लिये नहीं किया गया सरकार और किसी की शख्सियत अपने फैसलों और काम से चढती और गिरती है उसमें मीडिया का रोल सिर्फ उन फैसलों के सभी पहलुआें को दिखाने की होती किसी को बनाने और बिगाडने की नहीं। ये सब इसलिये क्योंकि आजकल लोग खबरें कम खबरों के पीछे मकसद को ज्यादा देखने की कोशिश करते हैं। खबर सिर्फ खबर है…

 

-ब्रजेश राजपूत,एबीपी न्यूज,भोपाल

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