सत्यदेव और रामपाल

– विजय मनोहर तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार

सत्यदेव और रामपाल। इन नामों से ऐसा लगता है कि चौथी-पांचवी सदी के किसी संस्कृत नाटक के दो पात्र होंगे। बड़े गरिमामय नाम हैं। मगर अक्सर नाम का आपकी बाकी चीजों से कोई तारतम्य होता नहीं है। ये दो नाम मध्यप्रदेश की दो बड़ी सियासी हस्तियों के हैं। सत्यदेव कटारे और रामपाल सिंह। कांग्रेस के सत्यदेव अब हमारे बीच नहीं हैं। बीजेपी के रामपाल जरूर अपनी सियासी बुलंदी पर हैं। सत्यदेव कांग्रेस की सरकारों में गृहमंत्री रहे। जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई तो नेता प्रतिपक्ष की हैसियत मिली। वे बहुत भले, सहज और मृदुल इंसान थे। रामपाल लोकनिर्माण मंत्री हैं। दोनों ही ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं।

आप समझ गए होंगे कि इन दोनों महानुभावों को मैं इनके सुपुत्रों के कारण याद कर रहा हूं। सत्यदेव कटारे नहीं रहे तो कांग्रेस ने उनके बेटे हेमंत कटारे को टिकट दिया। वे जीते और पहली बार विधायक बनकर विपक्ष में 15 साल से फाके कर रही कांग्रेस के फलक पर नमूदार हुए। रामपाल के प्रिय पुत्र गिरिजेश दो दिन पहले सुर्खियों में आए हैं। मगर किसी पद या टिकट की वजह से नहीं। एक बिगड़ैल नवाबजादे के रूप में। अपनी पसंद से उन्होंने एक कन्या से शादी की, जो मंत्री पद पर विराजमान पिता को हर्गिज कुबूल नहीं हो सकती थी। जातिगत बराबरी की बातें भाषणों या फिल्मों में ही अच्छी लगती हैं।

एक पड़ोसी ड्राइवर की बेटी को मध्यप्रदेश का केबिनेट मिनिस्टर भला क्यों अपनी बहू के रूप में स्वीकार करेगा? इसके लिए बड़ा पद नहीं, बड़ा कद चाहिए, उससे भी बड़ा कलेजा चाहिए, जो अक्सर बड़े पद वालों को ऊपरवाला देता ही नहीं। तो यह शादी बस आर्य समाज के एक सर्टिफिकेट में रही या उस अभागी बेटी प्रीति रघुवंशी के अधर में अटके सपनों में। आर्य समाज के मंदिर में पवित्र अग्नि के फेरे लेने के बाद प्रीति को चूंकि मंत्री महोदय ने बहू माना नहीं तो गिरिजेश ने उसे उसके घर भेज दिया इस वादे के साथ कि वह अपने ताकतवर बाप को जल्दी ही मना लेगा।

गिरिजेश ने अपने पिता को मनाने के लिए क्या कोशिशें कीं, यह बाप-बेटे ही जानते होंगे मगर जो अगला दृश्य प्रीति ने देखा, वह गिरिजेश की दूसरी शादी की तैयारी का था। रामपाल को अपनी हैसियत का रिश्तेदार मिल गया। उन्होंने बेटे की बात ताे नहीं मानी मगर बेटा नए रिश्ते के लिए उनसे राजी हो गया अौर सागर में सगाई की रस्म में जा पहुंचा। दस महीने से सपनों में ही सुनहरे भविष्य के रंग भर रही प्रीति के लिए यह एक सदमा था। इस धोखे को सहन करने की ताकत उसमें नहीं होगी। उसने अपनी जीवनलीला खत्म कर ली। अब तक रामपाल और चंदनसिंह के घर की चारदीवारी या करीबियों तक सीमित रहा यह प्रेम और परिणय प्रसंग मीडिया की सुर्खी में प्यार, धोखा और खुदकुशी की कहानी बनकर सबके सामने आ गया।

 

इस त्रासद कहानी में सियासी तौर पर ताकतवर एक बाप है, जिसके लिए जैसा भी हो बेटा तो अपना है। सत्यदेव कटारे जीवित होते तो वे अपने चिरंजीव हेमंत के लिए क्या करते, हम बिल्कुल अंदाज नहीं लगा सकते। तब हेमंत को कायरों की तरह छिपने की नौबत आती या नहीं, कौन जाने। बाप की विरासत विधायक के रूप में तो मिली मगर जल्दी ही वे अपनी करतूत के कारण फरारी में चले गए और दस हजार का इनाम उन पर घोषित हो गया। गिरिजेश खुशनसीब हैं कि उनके पूजनीय पिता रामपाल न सिर्फ जीवित और स्वस्थ हैं, बल्कि अभी सत्ता में हैं। तो किस खाकी वर्दी वाले ने मां का दूध पिया है, जो मामले को सही जांच तक ले जाए और गिरिजेश को पूछताछ के नाम पर ही सही, थाने में ला बैठाए। उसका जुलूस निकालना तो दूर की बात है।

अभी पूरी ताकत प्रीति के गरीब परिवार काे समझाने में लगी है। प्राण जाए पर वचन न जाए वाले रघुवंशी समाज के लोगों ने प्रीति के बाप को समझाया कि लाश को क्यों सड़ाते हो? उसे दाग दो। अपन कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे। इस समझाइश पर जैसे-तैसे पोस्टमार्टम के बाद गुमनाम मर्चुरी में पड़ी प्रीति की देह को उठाकर सूखी लकड़ियों पर लिटा दिया गया। भाई ने आखिरी रस्म अदा कर दी। मगर क्षत्रिय रक्त गिरिजेश कायरों की तरह कहीं जा छिपा। घर में उसे न अपना क्षत्रिय धर्म किसी ने सिखाया था, न एक सच्चे प्रेमी का मतलब उसे मालूम था। वर्ना वह दूसरी सगाई के लिए बाप के साए में जाने की बजाए हिम्मत से प्रीति के साथ अपना घर बसाता। अपनी मेहनत से अपना नाम कमाता। अपना पुरुषार्थ दिखाता।

शौकीन मिजाज गिरिजेश के लिए आसान था कि वह महंगी कारों में घूमे। ब्रांडेड कपड़े और चश्मे पहने। लाखों के कुत्ते पाले। पिस्तौल दिखाए। शहर में आकर हुक्का-बार में घूमे। उसमें वह दम ही कहां से आता, जो अपने प्यार के लिए खड़ा होता। दिखावे के लिए उसके पास जो कुछ भी था, वह उसके पसीने या काबिलियत की कमाई से नहीं था। मुमकिन है प्रीति जैसी और भी लड़कियां उसकी फ्रेंड लिस्ट में रही हों। प्रीति के लिए भले ही वह सपनों का राजकुमार होगा मगर बाप की दौलत पर पलने वाले दसवीं पास गिरिजेश के लिए प्रीति एक भावुक भूल भर ही रही होगी।

 

अब हम फिर से सत्यदेव और रामपाल पर आते हैं। हम इन्हें भाषणों से जानते हैं। पदों से पहचानते हैं। कांग्रेस मूल के सत्यदेव के जीवन में अनगिनत प्रसंग ऐसे आए ही होंगे, जब उन्होंने अपने भाषणों में महात्मा गांधी के आदर्शों को दोहराया होगा। रामपाल भी पंडित दीनदयाल उपाध्याय की सादगी, संस्कार और ऊंचे आदर्शों पर बाेलते ही होंगे। महान आदर्शों के ये उपदेश दोनों ही अपनी संतानों को क्यों नहीं समझा पाए? वे आम पिता नहीं हैं। वे खास हैं। अपने पद और प्रतिष्ठा से दोनों ही आम पिताओं जैसे नहीं हैं। आम लोग उनसे अतिरिक्त की अपेक्षा करते हैं कि जो आप कहते हैं या जिस विचारधारा की पार्टी में आप हैं, उसके सिद्धांतों अौर आदर्शों की कोई झलक आपके अपनों में कहीं तो नजर आए। हेमंत कटारे और गिरिजेश की कहानियां हमें मजबूर करती हैं कि हम देखें कि ऊंचे ओहदों पर बैठे नेताओं-अफसरों के अपने घरों में क्या चल रहा है?

अगर प्रीति ने जान न दी होती और रामपाल मामले को चंद लाख या करोड़ में सेटल कर चंदनसिंह के परिवार को उदयपुरा से कहीं बाहर जमा देते तो हमें कभी उनके लख्ते-जिगर गिरिजेश प्रताप की इस घिनौनी और कायराना करतूत का पता ही नहीं चलता। हममें से कई लोग, जो राजनीति या मीडिया में हैं, माननीय मंत्री महोदय श्रीमान रामपाल के न्यौते पर भोपाल के किसी आलीशान होटल में गिरिजेश और उसकी नई दुल्हन के रिसेप्शन में खींसे निपोर रहे होते। वहां चर्चा यह होती कि गिरिजेश युवा मोर्चा में कब सक्रिय होंगे और अगले चुनाव में टिकट की तैयारी कहां से करेंगे?

नाकाबिल औलादें अपने बाप की विरासत पर परजीवियों की तरह पलती हैं। सियासी घरानों में ज्यादातर बेटों की औकात इतनी ही होती है। वे बाप के सहारे खदानों और ठेकों की बेहिसाब कमाई के बूते बस पदों पर आ बैठते हैं। इसलिए पूजनीय हो जाते हैं। जिन बिगड़ैल बेटों के बाप बड़े पदों पर नहीं हैं, पुलिस जब अपनी वाली पर आती है तो भोपाल में हम देख रहे हैं कि कैसे उनके जुलूस निकालती है।

हेमंत और गिरिजेश खैर मनाओ, तुम जिनके बेटे हो, हम उन्हें सत्यदेव और रामपाल के नाम से जानते हैं। सियासत में तुम्हारे जुलूस शान से निकलेंगे। पुलिस कम्बख्त तो पहरा देने के लिए है।

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