संघ को खूब कोसिए, बिल्कुल मत छोड़िए

– विजय मनोहर तिवारी,वरिष्ठ पत्रकार

1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया तो देश के सारे विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं और उनसे किसी भी रूप में जुड़े बेकसूर लोगों को भी जेलों में ठूंस दिया गया था। हर जेलों में आरएसएस के लोग बड़ी तादाद में थे। संघ को पानी पी-पीकर कोसने वालों को जरा भी अंदाजा नहीं होगा कि उन दो सालों में देश के लाखों स्वयंसेवकों के परिवारों ने कैसी यातनाएं भोगीं। एक बार जेल जाने के बाद दिन गुजरे, हफ्ते गुजरे, महीनों बीते। कुछ समय तक लोग इस इंतजार में रहे कि जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा और वे जेल से बाहर आएंगे। लेकिन अंतराल लंबा खिंचता गया।

हर तरह ही आर्थिक स्थितियों के लोग जेलों में थे। छोटे कारोबारी, नौकरीपेशा, रोज कमाने वाले। आजादी के बाद यह पहला अनुभव था तब अंग्रेजों की हुकूमत की तरह अकारण जब जहां चाहे जिस आरोप में थोक में लोगों को जेलों में भर दिया जाए। जब महीनों गुजरे तो हर जेल में तरह-तरह की दिक्कतें दिखाई दीं। मुझे ग्वालियर सेंट्रल जेल में बंद शिवपुरी के स्वयंसेवक पंडित हरिहर शर्मा ने एक बार बताया था कि जेल में लंबा समय गुजरा और बाहर निकलने की संभावना खत्म होती गई तो एक स्वस्थ सज्जन पर गहरा मानसिक असर हुआ था। वे दिन के वक्त जेल के खुले अहाते में एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़ लगाते थे, जैसे अब उड़कर बाहर जाने वाले हों।

अधिकतर सीमित आमदनी वालों के जो परिवार पीछे छूट गए थे, वे भी क्रूर कांग्रेस सरकार की खुफिया पुलिस की कड़ी निगरानी में थे। उनके घरों पर आटा-दाल पहुंचाने वाले मददगारों पर भी पैनी निगाह रखी गई थी और लोग चाहकर भी किसी के लिए कुछ नहीं कर पा रहे थे। आमदनी बंद होने का बुरा असर परिवारों ने भोगा। इनमें बीमार और बूढ़े मां-बाप थे, शादी के लायक लड़कियां थीं, स्कूल जाते बच्चे थे, गर्भवती औरतें थीं। कई लोग जेलाें में बीमार पड़ गए। बाहर उनके मां-बाप चल बसे। बच्चियों की शादियां टूट गईं। नौकरियां जाती रहीं। घरों में लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए।

संघ ने पूरे लोकतांत्रिक ढंग से अपने आजाद मुल्क में अपनी ही सरकार की बेरहमी का मुकाबला किया। कोई नक्सली आंदोलन खड़ा नहीं किया। आपातकाल के बाद वे अपनी शस्त्रहीन शाखाओं में लौटकर फिर से भारत माता के गीत गाने लगे। अब की बार जरा और ऊंचे स्वर में। हम आज चारों दिशाओं में हरदम चौकन्ने मीडिया, आरटीआई और ताकतवर अदालतों के भरोसे में जीने वाले समाज हैं। कोई अंधेरगर्दी नहीं है। लेकिन शक्तिशाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आगे तब किसी की हिम्मत नहीं थी कि चूं कर जाता।

भारत लौटने के बाद महात्मा गांधी अपनी सीमित जरूरतों के साथ जीवन भर जिस सादगी की मिसाल बनकर रहे, वैसा आपने कितने कांग्रेसियों को जीते हुए देखा? पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक बार ट्रेन में सफर कर रहे थे। संयोग से उसमें सरसंघचालक गुरु माधवराव सदािशव गोलवलकर भी सवार थे। गुरुजी फर्स्ट क्लास में थे। दीनदयालजी सामान्य दरजे के डिब्बे में। एक स्टेशन पर दीनदयालजी गुरुजी से कुछ जरूरी चर्चा के लिए उनके डिब्बे में चले गए। इस बीच दो-तीन स्टेशन गुजरे। अगले स्टाॅप पर दीनदयालजी वापस अपने डिब्बे में लौटकर टिकट चैकर की तलाश करने लगे। टीसी आया तो उससे अतिरिक्त किराया लेने को कहा। टीसी हैरान था। पंडितजी बोले कि मेरे पास जनरल डिब्बे का टिकट है और करीब आधा घंटा मैं फर्स्ट क्लास में बैठा। इसके लिए मुझे अलग से किराया देना ही चाहिए। टीसी ने पूरी नौकरी में ऐसा दूसरा आदमी नहीं देखा था। जैसे-तैसे मामला सुलटा। संघ के प्रचारकों के जीवन की यह एक प्रतिनिधि कहानी है।

हममें से हजारों लोग कन्याकुमारी गए होंगे। विवेकानंद रॉक पर तस्वीरें ली होंगी। समुद्र के भीतर यह एक ऐसी जगह है, जहां दिन भर में दुनिया भर से आए सैलानी हर पल हजारों तस्वीरें लेते हैं। यह अाधुनिक भारत के प्रवक्ता स्वामी विवेकानंद का स्मारक है। इसके बनने की कहानी कम लोग जानते हैं। यह 1963 की बात है। स्वामी विवेकानंद की जन्म शताब्दी का प्रसंग आया। गुरु गोलवलकरजी के समय एकनाथ रानाडे संघ के सरकार्यवाह थे। संघ में दूसरे नंबर की ताकतवर हैसियत। गुरुजी ने यह काम 49 वर्षीय एकनाथ रानाडे को दिया। रानाडे के लिए अब यही जीवन का मिशन था। तमाम विध्नसंतोषियों ने इसका विरोध किया। विवेकानंद मेमोरियल का प्लान लेकर रानाडे अगले सात साल तक वे देश भर में घूमे। करीब 30 लाख लोगों से सीधी मदद ली। विधायकों, सांसदों, मंत्रियों से मिले। 1970 में यह भव्य स्मारक देश के सामने आया।

स्वामी विवेकानंद दिसंबर 1892 में भारत की इस आखिरी चट्‌टान पर जाकर तीन दिन तक ध्यानमग्न रहे थे। यहीं से उन्होंने घोषणा की थी कि अब ऋषियों के धर्म को बाहर ले जाना होगा। वे सितंबर 1893 में शिकागो में भारत का एक नया ही परिचय दुनिया को देते हुए सुने गए। एकनाथ रानाडे की समर्पित कोशिशों ने एक जीवंत स्मारक भारत की अनंत स्मृतियों में अंकित कर दिया। संघ से बाहर कितनों को इन प्रयासों का अता-पता है? यह तो स्थाई महत्व के ऐसे काम हैं, जो दिखाई देते हैं। कई प्राकृतिक आपदाओं के समय हजारों स्वयंसेवकों को सेवा में जुटते देश ने अक्सर देखा है। वे प्रचार के भूखे दूसरे संगठनों की तरह इन कामों में नहीं लगते। कोई तारीफ करे, चर्चा करे, खबर-फाेटो छापे, ऐसा कोई ख्याल भी उनके जेहन में नहीं होता। ये कैसे माइंड सेट के लोग हैं?

संघ से बीजेपी में आए प्रचारक एक अलग राजनीतिक माहौल में खुद को खपाते हैं। मैं नहीं कह रहा कि सब अपने प्रचारकों के पूर्व जीवन की तरह इस माहौल में संतों जैसे रहते-जीते होंगे। हो सकता है सत्ता की चमक-दमक कुछ पर कुछ हद तक असर डालती होगी। पदों की महत्वाकांक्षाएं पैदा होती होंगी। मगर संघ उनसे अपेक्षा बहुत सख्त करता है। उनकी राजनीति में उपस्थिति खेल का हिस्सा बनने के लिए नहीं है। उन्हें अपने आचरण से यह सिद्ध करना होता है कि वे कीचड़ में कमल जैसे होंगे। बीजेपी जिस निशान पर जनता के सामने जाती है वह कमल। बाकी राजनीति किसी भी निशान पर हो, दलदल ही है। सब जानते हैं।

कुप्पहल्ली सीतारमैया सुदर्शन सरसंघचालक की जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद भोपाल आ गए थे। वे पहले की तुलना में अब सहज उपलब्ध थे। मुझे उनसे कई बार मिलने का मौका मिला। एनडीए के संदर्भ में राम मंदिर, कॉमन सिविल कोड और काश्मीर के मुद्दे पर एक बार बात छिड़ी। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस इन मुद्दों पर देश के हित को सबसे पहले रखे तो हम उसे समर्थन देंगे। अगर बीजेपी ने सत्ता की सियासत में इन मूल मुद्दों को भुलाया तो हम दूसरी पार्टी भी खड़ी कर सकते हैं। हमारा किसी पार्टी विशेष से मोह नहीं है, न हम उसके ठेकेदार हैं। हमारे लिए विचार पहले है, राष्ट्र सर्वोपरि है। सत्ता में आने के बाद बीजेपी वालों के तौर-तरीकों पर कटाक्ष करते हुए एक संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी की टिप्पणी है- बेटा कितना भी बिगड़ जाए, बाप उससे आखिर तक निभाता ही है। अब जैसे भी हैं कम से कम संघ के मूल मुद्दों पर राजनीति में वही हैं, जिनसे हम अपनी बात आगे चला सकते हैं। दूसरे तो और बेगैरत हैं।

एक आखिरी बात। भारत जैसे जटिल समाज में, जहां लोग काम को हमेशा दूसरों पर और कल पर टालने में जन्मजात सिद्धहस्त हैं, मैं मानता हूं कि आरएसएस के सेवाभावी लोगों का माइंड सेट किसी चमत्कार से कम नहीं है। कटु सच है कि हम एक आलसी और मक्कार समाज हैं, जो हजार साल की गुलामी से पिसकर निकला है और हमने बेड़ियों में 40 पीढ़ियों तक वंश चलाया है। हमारी पहचानें बदली हैं। बदली हुई पहचानों ने समाज की जटिलता को और गहरा किया है। ऐसे समाज में तमाम बदनामियों और बंदिशों को झेलकर अनुशासन और असीम धैर्य के साथ अपने उद्देश्य में जुटे रहने की मिसालें कितनी हैं?

अब आइए अपन संघ को जी भरकर काेसते हैं। बिल्कुल नहीं छोड़ते हैं। बेड़ा गर्क हो इनका।

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