श्रीदेवी की मौत…त्रासदी और तमाशा

– सौरभ तिवारी, (सहायक संपादकIBC24)

किसी की मौत कैसे त्रासदी, फिर तमाशा और आखिर में मजाक बन जाती है, श्रीदेवी उसकी दुखद बानगी है। मौत को इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए दो कारक जिम्मेदार नजर आते हैं, पहला मीडिया और दूसरा हमारी अवधारणा।

बात पहले मीडिया की। फिल्म एक्ट्रेस श्रीदेवी की मौत ने मीडिया कवरेज के प्रारूप को एक बार फिर सवालों में ला दिया है। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या किसी सेलिब्रेटी की मौत खबरों की प्राथमिकता सूची में इतना ऊंचा मुकाम रखती है कि वो जनसरोकार से जुड़ी बाकी सारी खबरों का अतिक्रमण कर बैठे? सोशल मीडिया में ये सवाल प्रमुखता से पूछा जा रहा है कि एक अभिनेत्री की मौत पर इतनी मीडियाई मातमपुर्सी क्यों? सवाल उठाने वाले देश और समाज की बेहतरी के लिए श्रीदेवी द्वारा दिए गए योगदान का हिसाब मांग रहे हैं। सवाल कुछ हद तक जायज भी है, क्योंकि श्रीदेवी के हिस्से में फिल्म जगत मे हासिल उनकी निजी उपलब्धि के अलावा बाकी बताने लायक कुछ नजर आता भी नहीं है। तो क्या ये माना जाए कि किसी सेलिब्रेटी के महान घोषित होने के लिए उसकी निजी उपलब्धि के साथ उसका लोककल्याणकारी होना भी अनिवार्य अर्हता है। दरअसल इस मान्यता के पीछे नायकवाद की वो प्रचलित अवधारणा है जिसमें लोककल्याण की कसौटी पर खरा उतरे बिना नायकत्व अधूरा माना जाता है। नायकत्व के इस पैमाने के लिहाज से बेशक दिवंगत श्रीदेवी को मिल रहा मीडिया कवरेज अतिरेक नजर आए, लेकिन इससे उनके महान अभिनेत्री होने का जायज अधिकार छिन नहीं जाता।

दरअसल, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की असली दुविधा खबरों के आनुपातिक असंतुलन से जुड़ी है। लोगों का ये उलाहना नाहक नहीं है कि टीआरपी के प्रचलित फार्मूले पर फिट बैठने वाली किसी खबर के हाथ लगते ही मीडिया बौरा जाता है और वो उस खबर की तब तक पेराई करता है जब तक कि वो कचरा नहीं बन जाती। और दूसरी कोई ऐसी ही खबर आते ही फिर वही तमाशा शुरू।

श्रीदेवी के मामले में भी यही तमाशेबाजी चल रही है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया खबरों की पसंदगी या कहें कि बिक्री के लिए 4 C फार्मूले पर काम करता है। ये 4 C हैं- CRIME, CINEMA, CONTROVERCY & CRICKET । अब एक नए C यानी CELEBRITY ने इस फार्मूले में घुसपैठ कर अपना आधिपत्य जमा लिया है। तो श्रीदेवी के मामले में सिनेमा और सेलिब्रेटी के दो C तो पहले से ही मौजूद थे, और मौत के संदिग्ध होते ही क्राइम और कंट्रोवर्सी के बाकी दो C का तड़का भी लग गया। 4 C का सम्मिलन होते ही जनसरोकार की खबरों का हासिए पर जाकर श्रीदेवी की मौत को तमाशे में तब्दील तो होना ही था।

और अब बात श्रीदेवी की मौत से जुड़ी हमारी अवधारणा की जिसके चलते उनकी मौत को मिल रही तवज्जो को एक बड़ा वर्ग तौहीन नजरों से देख रहा है। ये राज उजागर होते ही कि श्रीदेवी की मौत शराब के नशे में बाथ टब में डूबने से हुई है, वो एक बड़े वर्ग की सहानुभूति खो बैठती हैं। नैतिकता का ये पैमाना इतना असरकारक है कि श्रीदेवी का नाम मध्यप्रदेश विधानसभा में श्रद्धांजलि दिए जाने वाले दिवंगतों की सूची से भी हटा दिया जाता है। दरअसल, शराब सेहत और आर्थिक दुष्प्रभावों के अलावा नैतिकता से भी जुड़ा मसला है। शराब के शौकीन भले ये पढ़कर मुझे कोसें लेकिन हकीकत यही है कि शराबी कभी भी आम भारतीयों की नजरों में इज्जतदार नहीं रहा है। किसी की सारी शोहरत, उसकी सारी उपलब्धि बेकार है, अगर वो शराब की वजह से मरता है। यही वजह है कि कोई शख्स शराब की वजह से मरते ही सारी सहानुभूति खो बैठता है। लोग तो कहते भी हैं, अरे! दरुहा था, मर गया। लोगों को परमज्ञानी अमर सिंह की इस दलील से फर्क नहीं पड़ता कि श्रीदेवी वाइन पीती थीं, ना कि शराब। तभी तो लोग कह रहे हैं कि कोई देशी दारू पीकर गटर में गिरे या वाइन पीकर बाथटब में, वो है तो आखिरकार एक दरुहा ही, और दरुहा की मौत का क्या अफसोस? तो जैसा मैंने शुरू में कहा था कि श्रीदेवी की मौत त्रासदी से तमाशा और अब मजाक बना दी गई है। क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो श्रीदेवी के बाथटब में डूबने से मौत का खुलासा होने के बाद उनकी मौत का मजाक बनाने वाले चुटकले नहीं चल रहे होते। तो क्या शराब वाकई इतनी इज्जत लुटेरी है कि वो किसी शख्सियत की अपने हुनर से अर्जित कलात्मक जमापूंजी तक को लूट ले जाए?

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