शिवराज सरकार में “स्मार्ट फोन घोटाला”

भोपालः व्यापमं के बाद एमपी सरकार के खाते में एक और घोटाला जुड़ गया है। इस घोटाले का नाम है  “स्मार्ट फोन घोटाला” यह कहना है विचार मध्यप्रदेश के कोर कमेटी सदस्य अक्षय हुंका का. दरआसल बीजेपी ने 2013 चुनाव में युवाओं को आकर्षित करने के लिए सभी सरकारी कॉलेजों के विद्यार्थियों को स्मार्टफोन देने की घोषणा की थी। जिसको पूरा करने के लिए जीत के बाद भाजपा सरकार ने निभाते हुए सभी कालेजों में स्मार्ट फोन छात्र-छात्राओं को बांटे।लेकिन अब इन्हीं बांटे गए स्मार्ट फोन पर सवाल खडे होने लगे है। जिसको लेकर विचार मध्य प्रदेश ने सरकार पर घोटाले का आरोप लगाया है. और यह सब पीएम के ड्रीम प्रोजेक्ट “मेक इन इंडिया” के नाम पर फर्जीवाड़ा हुआ है.

शून्य रूपये टर्नओवर की कंपनी को मिला 3.75 लाख स्मार्टफोन का आर्डर 

विचार मध्यप्रदेश ने प्रेस रिलीज़ जारी कर जानकारी दी कि मई 2016 में मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कारपोरेशन (MPSEDC) ने 3.75 लाख फ़ोन के लिए टेंडर निकाला था। यह टेंडर कार्वी डाटा मैनेजमेंट सर्विस लिमिटेड (कार्वी) ने फोरस्टार अमोस्टा 3G5 मॉडल के फ़ोन के लिए जीता था। कार्वी ने फोरस्टार इंडस्ट्री लिमिटेड, चीन (FILC) को ओरिजनल इक्विपमेंट मैनुफक्चरर (OEM) बताया था। टेंडर शर्तों में स्पष्ट था कि ओईएम के पास स्मार्टफोन के उस मॉडल के लिए BIS सर्टिफिकेट होना चाहिए। हालांकि ओईएम के पास ऐसा कोई सर्टिफिकेट नहीं था। प्रोजेक्ट जीतने के तुरंत बाद कार्वी ने यह प्रोजेक्ट भारत में रजिस्टर्ड फ़ोरस्टार टेक्नो सोलूशन्स प्राइवेट लिमिटेड (FTSPL) को सबकॉन्ट्रेक्ट कर दिया। टेंडर शर्तों के अनुसार प्रोजेक्ट को सबकॉन्ट्रेक्ट करने के पहले MPSEDC से लिखित में परमिशन लेना ज़रूरी था।FTSPL 17 दिसम्बर 2014 को रजिस्टर हुई थी। कंपनी की वेबसाइट भी अगस्त 2015 में बनायी गयी थी। कंपनी का 2014-15 एवं 2015-16 का टर्नओवर शून्य था। इस कंपनी ने कमर्शियल ऑपरेशन इस प्रोजेक्ट के मिलने के बाद अक्टूबर 2016 में शुरू किया था। FTSPL फोन के कवर पर मेक इन इंडिया का लोगो का प्रयोग कर रही है, जबकि FTSPL का मेक इन इंडिया प्रोजेक्ट से कोई सम्बन्ध नहीं है। साथ ही कवर पर “मेड इन इंडिया” लिखा है जबकि FTSPL के ग्वालियर ऑफिस में केवल असेम्बलिंग की जाती है मैनुफैक्टरिंग नहीं। साथ ही साथ फ़ोन की क्वालिटी भी बेहद खराब है और कंपनी की वेबसाइट का कांटेक्ट फॉर्म और दिए गए हेल्पलाइन नंबर भी नहीं चल रहे हैं।

वही स्मार्ट फोन खरीदी की पूरी प्रक्रिया पर विचार मध्यप्रदेस ने कई सवाल खड़े किए हैं:

(1) ओईएम के पास BIS सर्टिफिकेट नहीं होने के बावजूद कार्वी को टेंडर कैसे अवार्ड किया गया?

(2) क्या कार्वी ने काम सबकॉन्ट्रेक्ट करने के पहले MPSEDC से लिखित परमिशन ली थी? यदि हाँ तो MPSEDC ने आपत्ति क्यों नहीं उठायी कि:

(a) कंपनी को स्मार्टफोन बनाने का कोई अनुभव नहीं है।

(b) कंपनी का टर्नओवर शून्य है।

(3) यदि परमिशन नहीं ली गयी थी तो MPSEDC ने अभी तक इसके खिलाफ कोई एक्शन क्यों नहीं लिया?

(4) मेक इन इंडिया के लोगो के दुरूपयोग के खिलाफ कोई शिकायत क्यों नहीं की गयी?

(5) सिर्फ घोषणा पूरी करने के नाम पर विधार्थियों को पुराने कॉन्फिग्रेशन के फ़ोन क्यों दिए गए जिन पर नयी ऍप्लिकेशन्स चलना संभव नहीं है ?

स्पष्ट तौर पर हर स्तर पर चीजें जानबूझकर नजरअंदाज की गयीं और इतने बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया। बिना बड़े नेताओं और आला अफसरों की मिलीभगत के इतनी बड़ी गड़बड़ संभव नहीं है। विचार मध्यप्रदेश मांग करता है कि

(1) इसकी उच्च स्तरीय समिति द्वारा जांच की जाए और दोषियों को सख्त सजा दी जाए।

(2) कार्वी डाटा मैनेजमेंट सर्विस लिमिटेड को ब्लैकलिस्ट किया जाए।

(3) विद्यार्थियों को स्मार्टफोन के स्थान पर उसकी कीमत के बराबर राशि उनके अकाउंट में दी जाएँ।

– “विचार मध्यप्रदेश के सदस्य अक्षय हुंका का कहना है कि जब घोषणा पूरी करने की बात आयी तो बहुत पुराने कॉन्फ़िगरेशन के स्मार्टफोन बांटे गए, जिन पर ऑपरेटिंग सिस्टम के नए वर्जन और एप्स ठीक से नहीं चल सकती हैं। इससे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सरकार केवल नाम के लिए घोषणा पूरी कर वाहवाही लूटना चाहती थी। पर अब जो जानकारी सामने आयी है उससे स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने इस घोषणा के माध्यम से विद्यार्थियों को नहीं बल्कि चंद लोगों को फायदा पहुंचाया है।”
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