रोटावैक करेगा बच्चों का डायरिया से बचाव

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देश के चार राज्यों हिमाचल प्रदेश,आंध्र प्रदेश,हरियाणा और उड़ीस के बाद अब मध्यप्रदेश सहित चार राज्यों में भी रोटावायरस वैक्सीन टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया जा रहा है.बच्चों में गंभीर डायरिया को लेकर अभी तक राष्ट्रीय टीकाकरण में कोई ऐसी वैक्सीन शामिल नही थी जिससे नवजात बच्चों में डायरिया से होने वाली बिमारी से उनका बचाव किया जा सके.एक अनुमान के मुताबित भारत में हर साल डायरिया से लगभग 80 हजार बच्चों की मौत हो जाती है.जिसको लेकर सरकार गंभीर रूप से विचार कर रही थी और शुरूआती दौर में पहले चार राज्यों में रोटावायरस वैक्सीन को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया गया था जिसके बाद अब मध्यप्रदेश,राजस्थान,असल,त्रिपुरा और तमिलनाडु भी उन राज्यों में शामिल हो जाएगें जहाँ रोटावैक टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल होगा.स्वास्थ्य मंत्रालय इसे 18 फरवरी को अगरतला में लांच करेगी.वही दूसरे चरण में जिन पाँच प्रदेशों के लिए रोटवैक लांच की जा रही है वहाँ प्रदेश स्तर पर ट्रेनिंग के बाद इसे नवजात बच्चों को पिलाया जाएगा.

इंडियान एकेडमी ऑफ पेडियाट्रिक्स के मेम्बर रहे डॉ.अश्वनी सयाल बताते है कि रोटावायरस वैक्सीन टीकाकरण में शामिल होने से डायरिया से होने वाली मौतों में कमी आएगी और इस पर नियंत्रण किया जा सकेगा.डायरिया से होने वाले दस्त में 40 से 50 प्रतिशत केसों में रोटावायरस इन्फेक्शन पाया जाता है.विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 2013 में 2लाख15हजार बच्चों जिनकी उम्र पाँच वर्ष से कम थी विश्व में रोटावायरस की वजह से मौत हो हुई वही भारत में हर सात मिनट में एक बच्चें की मौत हुई.जिसके लिए अभी तक राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में कोई वैक्सीन शामिल नहीं की गई थी और बाजार में जो वैक्सीन उपलब्ध थी उनकी कीमत बहुत अधिक थी.भारत जैसे देश में जहाँ प्रति व्यक्ति आय बहुत कम है वहाँ इतनी मंहगी वैक्सीन खरीद पाना हर किसी व्यक्ति के वश की बात नहीं थी जिसे देखते हुए सरकार ने देश में ही रोटवायरस वैक्सीन अपने राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल करने का फैसला किया.रोटावायरस वैक्सीन पिलाने से दो साल तक की आयु के बच्चों की दस्त से होने वाली मृत्यु दर को कम किया जा सकता है.रोटावायरस डायरिया के कारण शिशु में कुपोषण की जो स्थिति बनती है उसमें भी सुधार लाया जा सकता है.एक साल से कम आयु के शिशु (दो साल तक भी) को दस्त का इलाज कराने में माता-पिता का जो पैसा इलाज में खर्च होता है उसे बचाया जा सकेगा.

डॉ.अश्वनी सयाल बताते है कि डायरिया पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण है.दुनियाभर में पांच वर्ष से कम उम्र वाले करीब 7,60,000 बच्चों की मृत्यु डायरिया से प्रत्येक वर्ष हो जाती है.जबकि वैश्विक स्तर पर डायरिया के करीब 1.7 अरब मामले सामने आते हैं जिसमें प्रत्येक वर्ष, सभी उम्र समूह के लोगों शामिल होते है.वही डायरिया का सबसे बड़ा कारण कुपोषण को माना जाता है जिससे शिशु में रिहाइड्रेशन की स्थिति बनती है.डायरिया से बचाव के तरीके स्वच्छ पेयजल,सेनिटेशन का व्यवस्थित इंतजाम,साबुन से हाथ धोना,जन्म के पहले छह माह तक बच्चे को केवल स्तनपान कराना,बच्चों को पोषक आहार देना,संक्रमण को फैलने से बचाव संबंधी शिक्षा और रोटावायरस वैक्सिनेशन प्रमुख है.

शिशु को डायरिया होने पर इसका प्राथमिक इलाज ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्ट्स यानी ओआरएस का घोल पिलाकर जिसमें साफ पीने का पानी,नकम और चीनी को मिश्रण होता है करना चाहिए.साथ ही जिंक सप्लीमेंट्स से भी बार-बार होने वाले दस्त को रोका जा सकता है.इसके लिए शिशु को 14 दिनों तक लगातार जिंक टेबलेट दिया जाता है.कुपोषण से होने वाले डायरिया के इलाज के लिए बच्चों को पोषक खाद्य पदार्थ दिया जा सकता है.जिसमें दाल ,चावल का पानी दिया जा सकता है.

डॉ. अश्वनी स्याल के अनुसार चार राज्यों के बाद मध्यप्रदेश,राजस्थान,असम,त्रिपुरा और तमिलनाडु में टीकाकरण प्रोग्राम में शामिल होने जा रहा रोटावैक का वर्ष 1985 में पहली बार नयी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में इसका विकास शुरू किया गया था जिसमें डॉ.एन.के.भान की महत्वपूर्ण भूमिका रही.इसकी बड़ी खासियतों में इसकी कीमत कम होना भी माना जा रहा है.बच्चों के इस वैक्सिन के एक डोज की कीमत 54 रुपये निर्धारित है,जबकि इसके कुल तीन डोज का मूल्य 162 रुपये होगा.हालांकि, इससे पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत में इस तरह के दो अन्य वैक्सिन को मंजूरी दे रखी है, लेकिन उनके तीन डोज की कीमत करीब 2,500 रुपये है.लेकिन रोटावैक के राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल होने से यह सभी बच्चों को मुफ्त में पिलाया जाएगा.यह एक रोटावायरस वैक्सिन है, जिसे तरल रूप में पैक किया गया है.इसे रोटावायरस डायरिया से बचाव के लिए बनाया गया है.इसका प्रत्येक डोज 0.5 मिली है.बच्चे के जन्म के छह सप्ताह के बाद इसका पहला डोज दिया जा सकता है और चार सप्ताह के अंतराल पर अन्य दोनों डोज दिये जा सकते हैं.

देशभर में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में रोटावायरस से होनेवाला डायरिया मृत्यु के सबसे बड़े कारणों में से एक है.केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, देश में प्रति वर्ष 80 हजार से एक लाख बच्चों की रोटावायरस डायरिया के कारण मृत्यु हो जाती है.साथ ही प्रत्येक वर्ष करीब नौ लाख बच्चों को डायरिया के कारण अस्पतालों में भर्ती करना पड़ता है.यह रोटावायरस टीका स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और विज्ञान मंत्रालय द्वारा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत भारत में ही तैयार किया गया है.कुल मिलाकर राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में रोटावैक के शामिल होने से शिशु मृत्युदर में भारी कमी आएगी और नवजात शिशुओं को डायरिया से होने वाली मौतों से बचाया जा सकेगा.

 

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