ये सीएम जो तैरता भी है….

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– ब्रजेश राजपूत 

 

 

अजब इत्तेफाक है शिवराज सिंह चौहान पर लिखने बैठा हूं और आज के ही दिन ही वो अपने मुख्यमंत्री के कार्यकाल के दस साल पूरे कर रहे हैं। इन दस साल की यादें दोहरायें तो बहुत सारे चित्र गडड मडड होते दिखते हैं। मगर कुछ दृष्य ऐसे हैं जो भुलाये नहीं भूलते।

दृष्य एक, सन 2003 के नवंबर महीने के ही दिन। विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान हो गया था। कांग्रेस सरकार दस साल पूरे कर चुकी थी दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के सबसे बडे नेता थे मगर अपनी सरकार के अंतिम दिनों में वो और उनकी सरकार अलोकप्रियता के चरम पर थी. अपनी सरकार की लाज बचाने की जिम्मेदारी अकेले दिग्विजय सिंह पर ही थी। बीजेपी ने भी इस मोके पर चोका मारने की ठान ली थी. सत्ता में वापसी के लिये अपराजेय दिग्विजय सिंह के मुकाबले बीजेपी ने फायर ब्रांड उमा भारती को मैदान में उतार कर चुनावी चक्रव्यूह रचा था। मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह राघौगढ से चुनाव लड रहे थे। ये उनकी परंपरागत सीट थी जिस पर 1977 से कभी कांगे्रस नहीं हारी। दिग्विजय सिंह चोथी बार यहां से चुनाव लड रहे थे और ऐसे दिग्विजय सिंह से टक्कर लेने उतार दिये गये थे तब तकरीबन गुमनाम से शिवराज सिंह चौहान जो उन दिनों विदिशा से सांसद थे। शिवराज सिंह के नाम के ऐलान के बाद दिग्विजय सिंह कहीं दौरे से लौटे थे और हम उनकी प्रतिक्रिया के लिये एयरपोर्ट पर इंतजार कर रहे थे। दिग्विजय सिंह आये और शिवराज का नाम सुन मुस्कुराये और कहा कि शिवराज को बलि का बकरा बना दिया है बीजेपी ने। बलि के पहले जिस तरह से बकरे को माला पहनायी जाती है वैसा ही माला पहनकर शिवराज को राघौगढ में घुमाया जायेगा। हम सब को भी सीधे सादे शिवराज दिग्विजय सरीखे महाबली के सामने बेहद कमजोर उम्मीदवार ही लगे। जैसा कि होता है राघौगढ वीआईपी सीट थी। चुनाव कवरेज के लिये प्रादेषिक और राप्टीय मीडिया राघौगढ आता था और दिग्विजय सिंह से मिलकर ही लौट जाता था। चुनावों के दोरान हमें भी एक दो बार वराज और उनकी पत्नी साधना सिंह राघौगढ और मधूसूदनगढ की गलियों में प्रचार करते दिखे। बिहार के नेता सुषील मोदी शिवराज के प्रचार की कमान संभाले थे। वो भी हम मीडिया के मित्रों से शिवराज के प्रचार को थोडा बहुत दिखाने की चिरौरी करते थे। मगर मीडिया को तो बडे नाम वाला चेहरा चाहिये होता है शिवराज तब इतने बडे और बिकाउ नाम नहीं बन पाये थे। जैसा कि तय था दिग्विजय के सामने शिवराज सिंह हारे मगर जहाँ पिछले चुनाव में दिग्विजय को राघौगढ मे 82 फीसदी वोट मिले थे वो इस बार घटकर सिर्फ 54 फीसदी ही रह गये। दिग्विजय तो जीते मगर उनकी पार्टी को करारी हार मिली। कांग्रेस के दस साल के शासन का अंत हुआ और उमा भारती एमपी की नयी मुख्यमंत्री बनीं। 2003 के इस बडे चुनाव में शिवराज अपना छोटा सा रोल निभाकर दिल्ली चले गये। उमा के उम्मीदों से भरे शासन की चकाचोंध मे जनता और मीडिया ने भी शिवराज को भुला दिया मगर वक्त ने तो उनके लिये कुछ और ही सोच रखा था। आठ महीने बाद उमा भारती तो उसके पंद्रह महीने बाद बाबूलाल गौर भी मुख्यमंत्री पद से उतार दिये गये। और मध्यप्रदेश के अठारहवें मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चोहान ने 29 नवंबर 2005 को शपथ ली तो दिग्विजय सिंह सहित बीजेपी के कुछ पुराने नेताओं ने भी दावा किया था कि ये तीसरा विकेट भी जल्द ही गिर जायेगा। मगर शुरूआती मुष्किलों के बाद शिवराज सिंह की नजरें अब एमपी की राजनीतिक पिच पर जम गयीं हैं और उनकी मेराथन पारी का अंत अभी होते नहीं दिख रहा। हम राजनीति की इस बलिहारी पर हैरान हैं कि जिस व्यक्ति ने तेरहवीं विधानसभा के चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री के खिलाफ विधानसभा का चुनाव लडा और हारा वही नेता तकरीबन दो साल बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ ले कर शासन चला रहा है। विधानसभा मे दिग्विजय और शिवराज की सीटें आमने सामने हो गयी मगर रोल बदल गये. कुछ दिनों मे ही शिवराज ने बीजेपी के कई भारी भरकम नेताओं को किनारे लगा दिया और आज मध्यप्रदेश की राजनीति में नेता नंबर वन हो गये हैं। इन दस सालों मे शिवराज की जगह मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने वालों ने अब सपने देखने भी बंद कर दिए हैं.

दृष्य दो, शिवराज सिंह चोहान 29 नबंवर 2005 को राजभवन में मध्यप्रदेश के 18 वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेते हैं। अगले ही दिन वो दोपहर में अपने गांव जैत जा पहुंचते हैं। सिहोर जिले की बुधनी विधानसभा का छोटा सा गांव जैत जहाँ एक छोर पर नर्मदा नदी बहती है। जैत पहुंचे षिवराज घर और गांव के मंदिरों की पूजा करते हुये नर्मदा के घाट पर आते हैं और फिर कपडे उतार कर नदी में कूद पडते हैं। बेफिक्री से वो नदी में इस छोर से उस छोर तक तैरते हुये मां सरीखी नर्मदा का दुलार हासिल करते हैं। नर्मदा भी आल्हादित है क्योंकि गांव का शिवराज अब प्रदेष का मुखिया बन बैठा है। भोपाल में मेरे पास होशगाबाद के साथी आषीप मालवीय का फोन आता है। सर शिवराज के नर्मदा में नहाने और तैरने के शानदार विजुअल्स हैं। वो भी एक्सक्लूसिव। देर मत करो भेजो का आदेश मिलते ही। अगले आधे घंटे के बाद षिवराज के उधाडे बदन तैरते हुये विजुअल्स स्टार न्यूज की स्क्रीन पर चल रहे थे। ये सीएम तैरता है के षीर्पक के साथ। आमतौर पर बूढे और बुजुर्ग मुख्यमंत्रियों की भीड में युवा शिवराज के इस तरह तैरते हुये षाट अनोखे थे। हमारे चैनल ने ये विजुअल्स खूब चलाये। जैसा कि होता है अच्छी खबर चलते ही मीडिया के दोस्तों और कुछ अफसरों के फोन भी आते हैं, आने लगे। दोस्तों को शाट चाहिये थे तो अफसरों को आपत्ति थी कि उधाडे बदन सीएम के ऐसे विजुअल्स नहीं चलाना चाहिये। मगर शाट तो चल रहे थे हर बुलेटिन में हेडलाइंस से चिपक कर। षाम तक हम इस खबर के आनंद में मगन थे तभी फोन बजा सीएम हाउस से बोल रहे हैं सीएम साहब बात करेंगे। क्षण भर में सारा आनंद काफूर हो गया लगा अब सीएम की नाराजगी झेलनी होगी। पहले ही दिन नये सीएम से पंगा हो गया वगैरह वगैरह। ब्रजेश जी मैं शिवराज बोल रहा हूं। दूसरी तरफ से विनम्र आवाज सुनायी दी। अरे भाई आपने ये शाट चला दिये। अब इसमें खबर क्या है मैं तो हर बार गांव जाकर नर्मदा नदी में ऐसा ही नहाता हूं। घाट पर पूजा की कपडे उतारा और कूद गया। क्या आप वहां थे क्या। जी नहीं हमारा संवाददाता आशीष था। (हंसते हुये) थोडा अच्छा नहीं लग रहा पर चलिये कोई बात नहीं। अच्छा आईयेगा। इतना कहकर फोन रख दिया गया। शिवराज सिंह की ये नाराजगी की बानगी थी। इन दस सालों में सीएम शिवराज से कई दफा मिलना हुआ कभी अच्छे तो कभी बुरे मूड में, मगर मिलने के बाद जो चीज याद रह जाती है वो है उनकी यही विनम्रता।

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One Response so far.

  1. Tessica says:

    Whoa, whoa, get out the way with that good inmaofotirn.

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