यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है….

अभी कुछ महीनों पहले की ही तो बात है जब हम एबीपी न्यूज चैनल के कार्यक्रम महाकवि के लिये दुष्यंत कुमार जी पर बन रहे एपीसोड के लिये उनके घर की शूटिंग करने भोपाल के साउथ टीटी नगर के मकान नंबर उनहत्तर बटे आठ गये थे। घर के दरवाजे पर ही दुष्यंत जी के हस्ताक्षर वाली नेम प्लेट लगी थी जिस पर सफेद बैकग्राउंड पर नीली स्याही से दुष्यंत कुमार के हस्ताक्षर उकेरे गये थे। घर के डाइंग रूम में एक तरफ दुष्यंत कुमार तो दूसरी तरफ कमलेश्वर के बडी बडी तस्वीर सजी थीं और दुष्यंत जी की स्मृतियों पर हमसे बात करने के लिये मुंबई से आये थे दुष्यंत जी के बडे बेटे आलोक त्यागी और उनके साथ थीं उनकी पत्नी ममता जो कमलेश्वर जी की बेटी हैं। उस पुराने से अंधेरे कमरे में दो बडे साहित्यकारों के लिखे का प्रकाश हर ओर फैला हुआ था। आलोक जी कभी दुष्यंत जी तो कभी अपनी मां राजेश्वरी देवी और फिर अपने श्वसुर की बातें लगातार बताते जा रहे थे और मैं हतप्रभ सा सुन रहा था। लग रहा था उसी दौर में जा पहुंचा हूं जब दुष्यंत जी यहां पर रहे होगे और इमरजेंसी लगी होगी तो कितनी हिम्मत से ये लिखा होगा कि ” मत कहो कि आकाश में कोहरा घना है ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। सूर्य हमने भी नही देखा सुबह से, क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है,,, या फिर ” वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिये,,,, या ये साफगोई कि ” हमको पता नहीं था हमें अब पता चला, इस मुल्क में हमारी हुकुमत नहीं रही,,, और फिर वो लाइनें जिनके बिना नेताओं की तकरीर पूरी नहीं होती ” कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो,,, या अरविंद केजरीवाल की पसंदीदा लाइन “मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिये,,, दुष्यंत जी की लिखी ऐसी कितनी लाइनें हैं जो ऐसा लगता है कल ही बैठकर आज के लिये ही लिखी गयी हैं। और वो लाइनें इन कमरों में ही बैठकर लिखीं गयी होगी। क्या विचार चलते होगे कवि के मन में कैसे वो उनको कागजों पर इस छत के नीचे बैठकर कागजों पर उतारता होगा और क्या उन्होनें कभी सोचा होगा कि कागजों पर उनकी लिखी लाइनें लोगों के दिलों में लिख ली जायेंगी और जुबान पर मोके बेमोके पर जुबान आ जायेंगी।
और आज जब उन्हीं आलोक जी के साथ यहां पर आया हूं तो साउथ टीटी नगर के उनहत्तर बटे आठ का नामो निशान नहीं है। दीवारों और छत का अता पता नहीं है। दीवार और गिरी हुयी छत का मलबा भी दूर फेंककर ऐसा समतल कर दिया गया है कि लगता है बस कल से ही यहां काम षुरू होना है और स्मार्ट सिटी की इमारतें बस यहीं से बननी शुरू होनी है तुरंत। वो सुंदर सी दुष्यंत कुमार लिखी नेम प्लेट आलोक भाई के हाथों में है जो वो दुष्यंत कुमार संग्रहालय के संचालक राजुरकर राज को देने के लिये लाये हैं। ये सब कब हुआ। बस कुछ दिन पहले ही हमें नोटिस मिला कि स्मार्ट सिटी में आपका मकान आ रहा है सामान समेट लीजिये। आनन फानन में हमने सामान समेटा और अगले ही दिन इसे समतल कर दिया गया। शायद बहुत जल्दी में हैं स्मार्ट सिटी वाले। हम ये भी नहीं बता पाये कि ये मकान तो दुष्यंत जी की पत्नी राजेश्वरी जी को सरकार ने जीवन पर्यंत के लिए दिया वो अभी मेरे साथ हैं उनको अभी हमने बताया नहीं है कि मकान टूट गया है हांलाकि मालुम पडेगा तो नहीं मालुम वो कैसे व्यक्त करेंगी। क्योंकि हम इस मकान में तकरीबन पचास साल रहे। यहीं बैठकर पिताजी ने अपनी सारी गजलें लिखीं। यहीं पर साहित्यकारों का जमघट लगा रहता था। इस घर सिर्फ लेखन से जुडे लोग ही नहीं वो सारे लोग भी आते थे जो अलग अलग तरीके से जरूरतमंद होते थे उनको पता था कि पापा की बात बडे अफसर सुन लेते हैं। तभी वहां खडे वरिष्ट साहित्यकार राजेन्द्र शर्मा जी ने किस्सा सुनाया कि बालकवि बैरागी जब दष्यंत जी के निधन की खबर सुनकर यहां आये तो बताया कि बाहर उनको लाने वाला आटो चालक भी रो रहा है क्योंकि दुष्यंत जी की सिफारिश पर उसको आटो मिला था। भरे गले से आलोक कहते हैं ये मकान का टूटना उनके लिये छत और दीवार का मसला नहीं है बल्कि ये भावनात्मक दुख है हमारे और दुष्यंत जी के चाहने वालों के लिये। वो कहते हैं

हैरानी इस बात पर ज्यादा होती है कि इमरजेंसी में वो लोग जो जेल में बंद थे और आज लोकतंत्र के सेनानी कहलाकर मोटी पेंशन पा रहे है उनकी आवाज ही तो थे पापा और आज यही लोग सत्ता में है मगर किसी ने भी इस घर परिवार की सुध नहीं ली। अरे ये मार्डन स्कूल है यहीं पर मेरी मां पढाती थी और सीएम शिवराज जी उनके विदयार्थी रहे हैं।

खैर ये मकान तो विकास की आड मे टूट गया मगर थोडी दूर पर ही बने दुष्यंत कुमार स्मृति संग्रहालय को अब बचा लिया जाये क्योंकी उसे भी बेदखली का नोटिस मिल गया है। दुप्यंत कुमार जी के घर का मलबा शिकायती लहजे में हमें मुंह चिढा रहा था और शायद यही कह रहा था ,,,खंडहर बचे हुये हैं इमारत नहीं रही, अच्छा हुआ सर पे कोई छत नहीं रही। हमने ताउम्र अकेले सफर किया हम पर किसी खुदा की इनायत नहीं रही।।,,,

– ब्रजेश राजपूत,एबीपी न्यूज,भोपाल

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