‘मुहब्बत का चिराग़’

FRONT COVER - Copy

जि़न्दगी बा-मज़ा नहीं होती , जिसमें माँ की दुआ नहीं होती।
प्यार माँ का मुझे नहीं मिलता, मुझसे जिस दिन ख़ता नहीं होती
दिल में जला के देख ‘मुहब्बत का इक चिराग,’
दैरो- हरम में जाने का फिर दिल नहीं रहे।।

‘‘मुहब्बत का चिराग़’’ एक ऐसा गज़ल संग्रह जिसमें रूहानियत है प्यार का जज्बा है,और हर उस शख्स के लिए मुहब्बत का पैगाम है जो अपने वतन से प्यार करता है, जो अपने परिवार और समाज से प्यार करता है, कमल किशोर दुबे यह नाम मोहताज़ नहीं है परिचय का श्री कमल किशोर दुबे ‘‘कमल’’ पश्चिम मध्य रेल भोपाल मण्डल में जन सम्पर्क अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं इस साहित्य के पुजारी की यह रचना ‘‘मुहब्बत का चिराग़’’ उनका पहला ग़ज़ल संग्रह है जो अपने उन्वान के मुताबिक मुहब्बत का पैग़ाम देता है.उनके इस ग़ज़ल संग्रह में शामिल 101 ग़ज़लों की ख़ासियत यह है कि इन गज़लों में प्यार तो है लेकिन रोमान्स नहीं है. आम आदमी के सरोकार, उसकी पीड़ा, छटपटाहट, राष्ट्रीयता, साम्प्रदायिक सद्भाव, के साथ इन ग़ज़लों में शोषण, अत्याचार, राजनैतिक स्वार्थपरता, अराजकता, की निशानदेही बड़ी खूबसूरती के से की गई है. ‘मुहब्बत का चिराग़’ के शेरों को पढ़कर पाठक के मन से एक आवाज़ अवश्य उठेगी कि ‘‘अरे ! यही तो मैं कहना चाहता था।’’ मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे ‘‘कमल’’ ने अपनी शिक्षा-दीक्षा तथा लगातार अध्ययन से अपने विचारों को परिपक्वता दी, जिसने उनकी लेखनी को एक अनोखी धार प्रदान की, जिसके लिए लगभग हर कलमकार लालायित रहता है.

23 मार्च को म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति एवं हिन्दी भवन न्यास द्वारा हिन्दी भवन भोपाल में आयोजित बारहवीं बसंत व्याख्यानमाला के अवसर पर कमल किशोर दुबे ‘कमल’ के ग़ज़ल संग्रह ‘‘मुहब्बत का चिराग़’’ का लोकार्पण मुख्य अतिथि भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री रमेशचन्द्र लाहोटी के द्वारा किया गया.

DSC_0139

उनके इसी ग़ज़ल संग्रह के कुछ अशआर पेश हैं:-
नफ़रत की आग दिल बुझाकर तो देखिए । उलफ़त इक चिराग़ जलाकर तो देखिए।
हर शख़्स पाएगा तभी खुशहाल जि़्ान्दगी, सीने से मुफ़लिसों को लगाकर तो देखिए।
औरों के साथ आप भी खायें न ठोकरें , राहों के पत्थरों को हटाकर तो देखिए।
खुशियाँ खुदा की नैमतें ये जान पाएँगें ,रोते हुए बशर को हँसाकर तो देखिए।।
निर्धन नहीं वो इन्सां दिल में हो प्यार जिसके,
जज़्बा मुहब्बतों का , दिल में जगाए रखना।।
तुमको जहां ने हिन्दू , मुस्लिम या सिख बनाया,
तुम खुद को इस जहां में, इन्सां बनाये रखना ।
म्युजि़्ायम की चीज़्ा ही बस रह गई इन्सानियत ,
है बहुत मुमकिन मिले ये कल किसी लाचार में।
वो हिन्दू नहीं है , वो मुसलमान नहीं है । दिल से अगर , इन्सान वो इन्सान नहीं है।
भगवान का वो भक्त वो रहमान नहीं है। जिस दिल में भी निज देश का सम्मान नहीं है।
‘इन्सान’ वो इन्सान ‘कमल’ हो नहीं सकता, जिस दिल में किसी और का सम्मान नहीं है।।
मेरे शहर में आजकल बाज़्ाार हैं बहुत , बिकने लगे उधार में किरदार हैं बहुत।
आँधी चली थी ख़ूब मगर कुछ न कर सकी,बस्ती में मेरी फूस के घरबार हैं बहुत।
ग़्ौर के दिल में अपना बसर चाहिए ,बात में आपकी वो असर चाहिए ।
आज कुर्सी की ख़ातिर हैं पागल सभी, हमको सरदार जैसा सदर चाहिए।
सबने अपने बनाये हैं ख़ेमे यहाँ , देश को जोड़ दे वो बशर चाहिए।।
सोचो बुरा न ग़ैर का ,सब जन सुखी रहें, सारे जहां की नैमतें संसार के लिए। जीवन वही है आए जो औरों के काम भी, जीवन नहीं है देह के व्यापार के लिए।।
दुनिया में सभी सरहदें इन्सां ने बनायीं, अल्लाह के घर कोई भी नक़्शा नहीं होता।
भगवान के घर में सभी इन्सान बराबर, भगवान के दरबार में दर्जा नहीं होता ।।
और, जि़्ान्दगी में मुहब्बत अगर चाहिए, अपने दिल में सनम का बसर चाहिए।
चाहते हो ज़माने की खुशियाँ मिलें, तो दुआओं में अपनी असर चाहिए।।
तितलियाँ झूमकर पास आ जाएँगीं, खुशबुओं में ‘कमल’ वो असर चाहिए।।

Please follow and like us:

One Response so far.

  1. Rochi says:

    Hi. nice post. i am planing to go mathura in January 2013. I am a Fine artist. I love phopgorathy. For my photography i need your help that; i want to know which places i can go in mathura. Also How many days i have to stay in mathura. Pls suggest. ThanksRavi Divawala

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

mpheadline.com@gmail.com
http://www.facebook.com/mpheadline
SHARE