बस्तर का एक रंग यह भी… “विकास यात्रा”

-सत्येंद्र खरे के साथ

विकास यात्रा का तीसरा दिन, कोंडागांव

मुर्गो की लड़ाई कराना, पैसा कमाना और मनोरंजन करना अमूमन आपने और हमने पाकिस्तान अफगानिस्तान के कबीलाई क्षेत्रो के लिए सुना होगा ।

लेकिन यह बस्तर है, यहां मैंने मुर्गो पर लगते दाव देखे है । बदलते दौर में जब हमारे पास मनोरंजन के अनेक साधन है ऐसे में बस्तर के आदिवासी भाई आज भी अपने मनोरंजन के लिए मुर्गो की लड़ाई कराते है और इस लड़ाई से वे कुछ पैसा भी कमा लेते है । गांव खेड़ों में कुछ परिवार का यह आजीविका का साधन भी है ।

विकास यात्रा के साथ हम जगदलपुर और कोंडागांव के रास्ते पर थे, सड़क किनारे एक जगह देखा तो बहुत भीड़ थी, पंकज भाई जो हमारे सारथी है मूलतः छत्तीसगढ़िया है उन्होंने बताया सर रुकते है , यहां आज बाजार है, आपको मुर्गो की लड़ाई दिखाते है । पंकज की बात सुनते ही अपन भी फटाक से तैयार हो गए , चलो देखते है …

बस्तर के सुदूर अंचलो में जहां साप्ताहिक हाट लगते है वहां आदिवासी एक गोल रिंग (कुश्ती मैच के माफिक) बनाते है, अपने पाले हुए तंदरुस्त मुर्गे लाते है, लोगो के सामने उनकी नुमाइंदगी करते है, उसके बाद दो मुर्गो में मुकाबला तय होता है । इसके बाद पास खड़े आदिवासी भाई जो पैसा लगाना चाहे वो मुर्गे के रंग को बताकर पैसा लगाते है, कई बार यह पैसा या सट्टा हज़ारो में होता है यह सब होने के बाद मुर्गो के पंजे में ब्लेड नुमा लोहे की पट्टी बांधते है जिससे जब मुर्गे आपस में लड़े तो एक दूसरे को घायल कर सके ।

आपको बता दे कि मुर्गो की यह लड़ाई तब तक चलती है जब तक कोई एक मुर्गा मर न जाये इसमे एक महाशय मैच रेफरी भी होते है जो मैच का रिजल्ट भी बताते है ।

लेकिन इस खेल में एक और मज़ा है, जहां यह लड़ाई होती है वहां ताड़ी (देशी शराब) का इंतजाम भरपूर रहता है , जैसे जैसे जाम बढ़ते जाते है वैसे मुर्गो पर लगने वाला दांव भी बढ़ जाता है ।

अब आप एक बार सोचिए कि बड़े बड़े बार रेस्टोरेंट में आईपीएल के मैच में सट्टा लगता है लोग पैसा कमाते है उसमें भी वो मज़ा नही जो गोल रिंग में मुर्गो की लड़ाई कराने से आदिवासी भाई कमा रहे है …. अपनी छोटी सीमाओं में बंधे असीमित आनंद का क्षेत्र है बस्तर

आदिवासियों के ऐसे ही रंग बिरंगी दांस्तान और संस्कृति के साथ कल फिर कोई नई रोचक बात …

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