तेरा मीडिया मेरा मीडिया इसका मीडिया उसका मीडिया

– ब्रजेश राजपूत, विशेष संवाददाता एबीपी न्यूज

 

मौका था मध्यप्रदेश विधानसभा में प्रश्नकाल का और मीडिया को दिये गये विज्ञापनों से लेकर पूछे गये एक सवाल के जबाव में बहस की दिशा ही बदल गयी। एक तरफ थे कांग्रेस विधायक जीतू पटवारी तो दूसरी तरफ थे संसदीय कार्य और जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा। बहस की गर्मागर्मी और तनातनी में कब और किसने मीडिया को चोर कह दिया कोई समझ ही नहीं पाया। मीडिया को लेकर अभद्र टिप्पणी करने पर दोनों दलों के नेता एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने लगे। उधर मीडिया की दीर्घा में बैठे हम मीडिया से जुडे लोग हैरान थे कि ये हो क्या रहा है मीडिया की मिजाजपुर्सी करने वाले नेता ही एक दूसरे की आड में मीडिया पर कीचड उछाल कर लथपथ किये जा रहे हैं। सदन की कार्रवाई में एक बार नहीं कई बार चोर चोर शब्द सामने आया। जैसा कि होता है जब गर्मागर्म बहस हंगामे की शक्ल में बदल गयी तो सदन की कार्रवाई स्थगित की गयी और फिर शुरू हुआ मीडिया के सामने ही मीडिया हिमायती बनने का खेल। मीडिया कक्ष में लगे ढेरों कैमरे और माइक के सामने आंसू बहाकर सहानुभूति बटोरने की कवायद शुरू हो गयी। बहस की शुरूआत करने वाले युवा नेता ने कहा कि हम तो असली मीडिया की आड में नकली मीडिया को मिल रहे संरक्षण की पोल खोल रहे थे चोर मंडली कहा मीडिया को चोर नहीं कहा। उधर बहस का प्रतिरोध कर रहे मंत्री जी आये और भरे गले से कहा कि बहुत दुख हो रहा है हम पर आरोप लगाओ मंजूर है मीडिया पर कीचड मत उछालो। हम सवाल पूछने वाले हैरान थे कि सदन की आपसी लडाई में मीडिया को लथपथ तो कर ही दिया अब बचा क्या। ये सारा नजारा बहुत कुछ ऐसा ही था जब दो लडाके लडाई देखने खडे दर्शकों को ही पीटने लगे और बाद में माफी मांगें कि यार गुस्सा बहुत आ गया वरना हम तो हमेशा से आपके साथी हैं।

पिछले कुछ दिनों में ये टेंड तेजी से बढा है मीडिया को ही घेरने का। फिर चाहे अपने पक्ष वालों को प्रेस बोलो और दूसरों को प्रेस्टीटयूट कह दो या फिर अपनी खबर छापने वाले असली मीडिया मानो और विरोध करने वाले नकली मीडिया कह दो। ये सब कह कर उस मीडिया पर छापे मारी की जा रही है जो पिछले कुछ सालों में घोषित और अघोषित पाबंदियों, प्रलोभनों के बीच भी वो काम कर रहा है जो उसके लिये नियत हैं। कुछ अपवाद जरूर हो सकते हैं मगर मीडिया आज भी भरोसे के पैमाने पर विधायिका और कार्यपालिका के उपर ही दिखता है तभी तो अपनी बात कहने तक के लिये सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों को मीडिया के सामने संयत शब्दों में अपनी पीडा बतानी पडी।
हैरानी इस बात की भी थी कि सदन में दोनों दलो के लोग मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जा रहे थे मगर ये चौथे स्तंभ को मजबूत करने की जगह उसे कमजोर करने और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाने और गाहे बगाहे उसकी मुश्के कसने में हमारी सरकार और सांसद विधायक मौका नहीं छोडते।

प्रेस को पहली बार फोर्थ इस्टेट या चौथा स्तंभ ब्रिटिश पार्लियामेंटीशियन एडमंड बुर्क ने कहा था। कामन हाउस में बहस के दौरान उन्होने प्रेस गैलरी की तरफ इशारा किया कि इस पार्लियामेंट में थ्री इस्टेट किंग राजा, क्लरजी धर्मगुरू और कामनर्स सांसद तो हैं मगर फोर्थ इस्टेट वहां है जो हमसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका में यही शब्द जब उपयोग किया जाता है तो उसका अर्थ विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका के अलावा मीडिया या प्रेस से हैं।

हमारे देश में भी ये ही शब्द उपयोग किया जाता है इस्टेट जिसका अभिप्राय ताकत या सत्ता शब्द को हम स्तंभ कहने लगे। मगर इस चौथे स्तंभ को संविधान ने कोई एक नियम बनाकर ताकत नहीं दी है। अभिव्यक्त्ति की स्वतंत्रता के दायरे में प्रेस और उससे जुडी स्वतंत्रता भी आती है जिसका उपयोग मीडिया या प्रेस वाले करते हैं। इस्टेट या सत्ता या स्तंभ कहकर प्रेस को गुमराह ही किया जाता है। सच्चाई इसके उलट है। ये अलग बात है कि गलत काम करने वाली सरकारें इस इस्टेट से डर कर उसको फायदा पहुंचाकर उसे अपनी तरफ करती रहीं है।

मगर सारी फोर्थ इस्टेट ऐसी नहीं है। इसलिये उसे प्रेस्टीटयूट तो कभी नकली मीडिया कह कर विश्वासनीयता कम करने की कोशिश की जाती है मगर प्रेस आम आदमी से आज भी सबसे ज्यादा जुडी हुयी है इसकी वजह है कि बाकी सारे इस्टेट या सत्ता पर कब्जा पाये लोग इस इस्टेट से डरते हैं और उसे अपने पक्ष में रखने की कोशिश में जुटे रहते है। मगर प्रेस का काम जनता के बीच रहकर जनता की आवाज उठाना है इसलिए मीडिया या प्रेस अपना वास्तविक काम करता रहता है जो सरकार के लिये हैरानी की बात होती है। सत्ता के पास और सत्ता से दूर दोनों पक्ष इसका उसका मीडिया करते रहते हैं मगर असल बात ये है कि इसका मीडिया और उसका मीडिया नही मीडिया जनता का है और जनता के साथ ही खडा दिखता है। मुंशी प्रेमचंद को यहां याद करना चाहूंगा उन्होने कहा था कि देश में हमेशा दो वर्ग होते हैं शासक और शासित, प्रेस की भूमिका शासित के मुंशी की है जो शासक के सामने उसके पक्ष की वकालत करे।

(सुबह सवेरे दैनिक पत्रिका में प्रकाशित)

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