टीवी रिपोर्टिंग की सच्चाई है, “ऑफ़ द स्क्रीन”…

-दिनेश शुक्ल, पत्रकार

पत्रकारिता के पेशे की सच्चाई को करीब से जानना हो तो डॉ. ब्रजेश राजपूत जी की हाल ही में प्रकाशित किताब “ऑफ़ द स्क्रीन” पढिए…टीवी कैमरे के पीछे की 75 कहानीयों के संग्रह में एक से एक बेजोड़ किस्से मिलेगें…पिछले 26 साल से सक्रिय पत्रकारिता में मीडिया की दोनों विधाओं प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक में समान अधिकार रखने वाले ब्रजेश जी ने सागर विश्वविद्यालय में अपने पढाई के दिनों से लेकर टीवी जर्नलिज्म में की गई स्टोरिज् के पीछे के किस्सो को बाखूबी किताब के पन्नों पर उकेरा है…इन कहानीयों में मैं भी हूँ और आप भी जिसे ब्रजेश जी ने बेहद संजीदा अंदाज में इसे एक किताब की शक्ल दी है…

“ऑफ़ द स्क्रीन” में लिखी गई कहानीयों में एक रवानगी है…तन्मयता है एक के बाद एक कहानी मन में पढ़ने की ललक पैदा करती है….किताब की भाषा शैली ऐसी रोचक है जिसे पढ़ते समय आँखों से सामने वह दृश्य बरबस ही तैरने लगते है जिन्हें ब्रजेश जी ने अपने अनुभवों के बाद गढा है…राजनीति के किस्से हो या वह टी.वी. स्टोरी जिस पर न्यूज़ चैनलों को खूब टीआरपी मिली हो…इस किताब में एक कहानी है, पत्रकारिता का पहला पाठः सागर से सीधे हरसूद पत्रकारिता के छात्रों के लिए यह बेहद ही रोचक और पत्रकारिता को करीब से समझाने की कोशिश इस कहानी में लेखक ने की है…

किताब प्रकाशित होने के बाद जब यह मेरे हाथ में पहली बार आई तो मैनें अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा था कि- “एक किताब जो बताती है पत्रकारिता की मुश्किलों को, एक किताब जो बताती है पत्रकारिता के संघर्ष को, एक किताब जो कहती है पत्रकारिता की नई-नई कहानीयाँ, एक किताब जो है पत्रकारिता के छात्रों के लिए…” मेरा मानना है कि ब्रजेश जी ने पत्रकारिता के हर पहलू को इस किताब में उजागर किया है…बेहद शांत से दिखने वाले ब्रजेश जी की टी.वी. जर्नलिज्म में पकड़ किसी से छुपी नहीं है उन्होनें बेहद संजीदा अंदाज में उन कहानीयों को कहा है जो टीवी पर खबर चलने के बाद कही न कही खो जाती है…इन कहानीयों में रोमांच है, इन कहानीयों में पत्रकारिता की कठिनाईयां है और उन पर विजय, इन कहानीयों में ढेर सा ज्ञान और प्रेरणा है जिसके लिए लोगों को यह किताब पढ़नी चाहिए…

यह किताब लोगों को इसलिए भी पढ़ना चाहिए क्योंकि यह किताब आम आदमी की कहानी कहती है…ऑफ़ द स्क्रीन खेत-खलिहाल की कहानी कहती है तो वही यहाँ दफ्तर की कहानी भी मिलेगी…राजनीति की उठापटक हो या राजनेताओं के किस्से सब मिलेगा इस किताब में…इस किताब में आपको एक रिपोर्टर मिलेगा जो खबरों से जूझता और विपरीत परिस्थितियों में रिपोर्टिंग कैसे की जाती है यह बताएगा…इसमें चक्रव्यू है तो खुद न्यूज़ बन जाने की कहानी भी…तो वही तीन दिन में तीन हजार किलोमीटर का चक्कर भी…ऐसे कितने ही किस्से है जो एक पाठक को बांधे रखने में यह किताब सफल लगती है…एक शायर के बाद शायद एक पत्रकार लेखक ही होगा जो साफगोई से यह कह पाएगा कि-

तुम्हारी फ़ाईलों में गाँव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आँकडे झूठे है ये दावा किताबी है….

ब्रजेश जी ने वही सब “ऑफ़ द स्क्रीन” के जरिए लोगों तक पहुँचाने की एक पहल की है जिसे किताब की शक्ल दी गई है…

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