टट्टी पर मिट्टी की कहानी…

ग्राउंड रिपोर्ट सुबह सवेरे

वैसे तो उस शख्स को पहली बार दफ्तर में ही चल रहे किसी टीवी चैनल पर देखा। टीवी स्क्रीन पर विजुअल्स में एक शख्स बंद पडे शौचालय में रखे कंडे और कूडा करकट निकालता है फिर झाडू लगाता है और बाद में उसी शौचालय की पूजा भी कर देता है।

जानकारी लेने पर सिंगरोली के वीरेद्र पांडे ने बताया कि ये दिनेश देशराजन है भोपाल में रहते हैं और स्वच्छता के प्रेरक का काम करते हैं। बस फिर क्या था दिनेश देशराजन को भोपाल आते ही हमने पकडा और एक दिन तडके हम भोपाल के पास के गांव निपनिया जाट में थे ये देखने कि स्वच्छता को लेकर कैसे वो प्रेरित करते हैं। गांव के बाहर ही दिनेश को शौच करते हुये जावेद मिल गया। दिनेश ने उसे प्यार से अपने पास बुलाया और उसे वहीं ले गये जहां उसने शौच किया था। उसे समझाया भाई तुमने जो गंदगी फैलायी है उस पर बैठी मक्खी किसी के भी मुंह पर बैठेगी और तुम्हारा शौच हमारे मुंह तक पहुंचेगा, इसलिये इस गंदगी पर थोडी मिटटी खोदकर डाल दो गंदगी का फैलना और बदबू बंद हो जायेगी। दिनेश ने अपने हाथ की खुरपी से पास की मिटटी खोदी और लगे डालने जावेद की गंदगी पर मिटटी। हमे थोडा अटपटा तो लग रहा था मगर हम माहौल को देख रहे थे और हमारे कैमरामेन साथी होमेन्द्र बडी तल्लीनता से ये सब शूट कर रहे थे।
अब दिनेश गांव की ओर चले तो रास्ते में फिर गंदगी दिखी और दिनेश ने बिना एक पल की देर किये खुरपी से मिटटी खोद कर डालने लगे। मुझसे रहा नहीं गया मैंने पूछा आपको ये काम करते घिन नहीं होती। जवाब था इसमें घिन कैसी ये तो पुण्य का काम है। मैं लोगों को बीमारियों से जो बचा रहा हूं। वरना हमारे देश में अस्सी फीसदी से ज्यादा बीमारी इसी गंदगी से जुडी होती हैं। और इस बीच में दिनेश को दिख गये प्रीतम जो लोटा लेकर मैदान की ओर भाग रहे था। अरे भाई बाहर क्यों जा रहे हो क्या घर में शौचालय नहीं है। है भैय्या मगर टूटा पडा है इसलिये बाहर जाते हैं। चलो हमारे तुम्हारे घर ले चलो ओर थोडी देर बाद ही दिनेश प्रीतम के घर पर थे। शौचालय क्या बिना छत और दरवाजे का एक छोटा सा कमरा था जिसमें कंडे और लकडियां भरी हुयी थी। दिनेश तुरंत शुरू हो गये पहले लकडियां हटायीं और उसके बाद लाओ झाडू, लाओ पानी, घर में रहने वाले हैरान कि एक सफेद बंडी पहने अंजान सा शख्स हमारा वो टायलेट साफ कर रहा है जिसे हमने कभी कुछ समझा ही नहीं । प्रीतम की पत्नी और बेटी ने झाडू दिनेश से लेनी चाही तो डायलाग मिला, इतने दिनों से ये गंदा पडा है साफ नहीं किया अब मैं भोपाल से आया हूं साफ करने तो करने दो। थोडी देर में शौचालय साफ था और प्रीतम को बताया जा रहा था कि जिसे तुम अधूरा कह रहे है उस पर दो तीन सौ रुपए के पत्थर रख दोगे तो काम लायक हो जायेगा टेंकर और मजे से यहां बैठकर शौच करना बाहर जाने की झंझट खत्म। प्रीतम की लडकी रेखा की मन की हो गयी थी उसके बार बार कहने पर भी घर के लोग इसे ठीक नहीं करा रहे थे। अब माता पिता दोनों शौचालय ठीक करने का वायदा कर रहे थे। मगर दिनेश देशराजन तो अब धीरे धीरे फार्म में आ रहे थे। बीस मिनिट में वो तीन घरों के टायलेट साफ कर चुके थे।उनके पीछे बच्चों और बडों की भीड गांव में घूमने लगी थी जिसे वो बातों बातों में सफाई का पाठ पढाते जा रहे थे। अब आया राकेश का घर। घर के बाहर ही बने शौचालय का दरवाजा खोलते ही बिडी के टोंटे और पान की पींकें स्वागत करतीं दिखीं।

बस फिर क्या था मंगाया झाडू और करने लगी सफाई पानी डाला और राकेश की पत्नी से कहा एक थाली में हल्दी चंदन रोरी और अगरबत्ती लाओ जल्दी। जैसा ही ये सामान आया तो दिनेश लगे शौचालय के दरवाजे पर स्वास्तिक बनाने। हल्दी और रोरी दरवाजे पर लगाया और अगरबत्ती जलाकर करने लगे शौचालय की पूजा। पूछने पर कहा ये सफाई का मंदिर है पहले इसकी पूजा करो फिर घर में बने मंदिर की पूजा करो। उधर राकेश और उनकी पत्नी का हाल बुरा एक तो गंदा सा शौचालय सबने देख लिया फिर ये पूजा मगर दिनेश ने मियां बीबी को समझाया शौचालय को मंदिर जैसा साफ रखोगे तो बीमारियों से बचे रहोगे।

थोडा आगे बढने पर श्रीबाई का घर था, देखा तो घर में कायदे से दो साफ सुथरे षौचालय बने थे, बस फिर क्या था दिनेश ने खुश होकर श्रीबाई के पैर छू लिये और कहा आप जैसे सारे गांव वाले हो जाये तो गांव से बीमारियां ही भाग जायेंगी। दिनेश देशराजन के इस काम को देखकर कहना कठिन है कि वो बुंदेलखंड यूनिवरसिटी से एग्रीकल्चर में एमएससी गोल्डमेडलिस्ट हैं कमाई की नौकरी करने की जगह सफाई को चुना और पूरे देश में जाकर लोगों को स्वच्छता के प्रति बीस सालों से लोगों को प्रेरित करने का काम कर रहे हैं। किसी भी भाषण बाजी से अलग है उनका काम। लौटते में दिनेश ने अपनी शिकायत सुनाई मैं आपको मोटिवेट नहीं कर पाया क्योंकि आपने किसी अजनबी की टटटी पर मिटटी पर नहीं डाली। यदि आप ऐसा करेंगे तो मैं मानूंगा कि आपने भी वो सीखा जो मैंने गांव वालों को सिखाया। अब मैं ऐसे कर्मयोगी के आगे भला क्या कहता।

 

ब्रजेश राजपूत,एबीपी न्यूज भोपाल

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