“आतंक पर कलम वार”

अमरनाथ यात्रा के दौरान बाबा बर्फानी के भक्तों पर आतंकवादियों के हमले से कवि भी आहत है…जहां राजनीतिक पार्टियां सिर्फ निंदा करने में लगी है वही कवि ने अपने शब्दों से आतंकियों पर वार किए है. मध्यप्रदेश  डबरा के रहने वाले कवि आदित्य राजौरिया ‘अजनबी’ ने कलम से अपनी पीड़ा जाहिर की है…

कविता:-

एक बार फिर उन्मादी ये, निर्दोषों से बोले हैं।
एक बार फिर निर्दोषों पर, फैंके बम हथगोले हैं।

बाबा अमरनाथ की राहें, मुश्किल करने निकले हैं।
आज मजहबी आतंकी फिर, छुपकर लड़ने निकले हैं।

सत्य सनातन धर्म हमारा, उसको भी ललकारा है।
भोले बाबा के भक्तों को, घात लगाकर मारा है।

सारा विश्व त्रस्त है इनसे, कायरो की औलादें हैं।
इंसानों की इस दुनिया में, सबसे कड़वी यादें हैं।

राह भटकना कहते हैं कुछ, छुपे हुए ग़ददार इन्हें।
मक्का और मदीना से फिर, क्यों है इतना प्यार इन्हें।

भटका राही राह देखकर, बिलकुल नहीं चला करता।
केवल दूजे धर्मों को ही, छुपकर नहीं छला करता।

हिन्दू मुस्लिम भाई भाई, ज्ञान अधूरा लगता है।
चुप होकर जो बैठा उनका, साथी पूरा लगता है।

आज नहीं सेक्यूलर कुत्ता, कोई कहीं पर भौंका है।
लगता इनका नाजायज वह, अब्बा इनको रोका है।

चीख रहे थे जो सूअर जब, मेनन वाली फाँसी को।
क्या हुआ है चुप बैठी उस, दिल्ली वाली खाँसी को।

पप्पू वप्पू सब चुप दिखते, बिलकुल बात नहीं करते।
वोट बैंक पर अपने वो तो, बिलकुल घात नहीं करते।

सिर के बदले सिर लाओगे, तुम भी खूब दहाड़े थे।
भाषण में अपने तुमने भी, दुश्मन खूब पछाड़े थे।

लेकिन अब क्या हुआ तुम्हें है, तुमने चुप्पी धारी है।
सत्ता मद में फूल गये या, वोटों की लाचारी है।

सिकुड़न पड़ती क्यों दिखती है, छप्पन इंची सीने में।
क्या खुद को गिरवी रख छोड़ा, मक्का और मदीने में।

केवल निंदा वाली बातें, करना अब तो बंद करो।
जिस कारण से चुना तुम्हें है, काम वही अब चंद करो।

अब भी गर हम ना जागे तो, खंड खंड हो जायेंगे।
हम सबके वो भोले बाबा, दूर कहीं खो जायेंगें।

नोट- कविता में कहे गए शब्द और भावना कवि की खुद की है, इससे एमपीहेडलाइन.कॉम का कोई लेना देना नहीं. एमपी हेडलाइन.कॉम सिर्फ प्रकाशक है।

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