अखण्ड भारत की परिकल्पना की नींव रखता ‘संघ परिवार’

किसी भी राजनैतिक दल की नींव मूल रूप से दो आयामों से पुष्पित – पल्लवित हुई है, वे हैं सिद्धांत और विचारधारा..कई ऐसे देश हैं जहां सैद्धांतिक राजनैतिक दल सत्ता के पक्ष या विपक्ष में रहकर जनसेवा कर रहे हैं, तो कहीं पर वैचारिक राजनैतिक दल भी अपना वजूद इसी तरह बनाये हुए हैं। यदि हम विचारधारा की बात करें तो वामपंथ विचारों से सिंचित राजनैतिक दल कई वर्षों से विश्व के विभिन्न देशों में अपनी सरकार बनाये हुए हैं, वर्तमान समय में विश्व के एक दर्जन से ज्यादा देशों में वामपंथ विचारधारा समर्थन की सरकार है। ठीक इसी तरह भारत में मौजूदा सरकार एक विशेष विचारधारा को समर्थित है, इसे हम ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ कह सकते हैं, इस विचारधारा की कल्पना को आकार दिया है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने…।  साल 1925 को सितंबर माह के सत्ताइसवें दिन यानि विजयादशमी को डॉ केशवराम बलिराम हेडगेवार द्वारा इसकी स्थापना का मूल उद्देश्य ही ऐसे अखण्ड भारत की परिकल्पना था, अखण्ड भारत की कल्पना में भारत के वो हिस्से भी शामिल हैं जो कभी भारत से अलग होकर स्वतंत्र राष्ट्र बन गये हैं। एक ऐसा अखण्ड भारत जो भारतीय संस्कृति के सतरंगी इंद्रधनुष से आच्छादित हो। उस दौरान 5 स्वयं सेवकों से बढ़कर आज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ करोड़ों स्वयं सेवकों का संगठन बना है, जो विश्व का सबसे बड़ा संगठन कहा जाता है।
 संघ के विस्तार को हम देखें तो जानेंगे कि साल 2015 में छपी टाईम्स न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक आरएसएस यानि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को दूसरे देशों में (एचएसएस) अर्थात् हिंदू स्वयंसेवक संघ के नाम से पहचाना जाता है। एचएसएस अधिकारिक तौर पर अमेरिका समेत 39 देशों में अपनी शाखाएं चलाता है। जिन 39 देशों में एचएसएस की शाखाएं लगती हैं, उनमें मध्य एशिया के 5 देश भी शामिल हैं। इन 5 देशों में सार्वजनिक तौर पर शाखाएं लगाने की इजाजत नहीं है, इसलिए स्वयंसेवक घरों में मुलाकात करते हैं। इतना ही नहीं फिनलैंड में तो सिर्फ एक ई – शाखा चलती है, वहां इंटरनेट पर वीडियो कैमरा के जरिए 20 से अधिक वैसे देशों के लोगों को जोड़ा जाता है, जिनके इलाके में एचएसएस की शाखा नहीं है। वहीं भारत से बाहर सबसे अधिक शाखाएं नेपाल में हैं और दूसरा नंबर अमेरिका का है, जहां हर राज्य में संघ की शाखाएं लगती है, जिसमें न्यूयॉर्क और वशिंगटन डीसी जैसे बड़े शहर भी प्रमुख हैं। माना जाता है कि संघ की पहली विदेशी शाखा साल 1946 में एक जहाज पर लगी थी, जिसे माणिकभाई रुगानी और जगदीश चंद्र शारदा नाम के 2 स्वयंसेवकों ने लगाई थी। वहीं विदेशी धरती पर संघ की पहली शाखा मोमबासा में लगी। इतना ही नहीं विदेशों में ज्यादातर शाखाएं हफ्ते में एक बार ही लगती हैं, लेकिन लंदन में ये हफ्ते में 2 बार लगती हैं।
भारत में लगने वाली शाखाओं में ‘भारत माता की जय’ के नारे लगते हैं, लेकिन दूसरे देशों की शाखाओं में ‘विश्व धर्म की जय’ के नारे लगते हैं। कुल मिलाकर वर्तमान में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लगभग 50 से ज्यादा संगठन राष्ट्रीय ओर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है। इतना ही नहीं लगभग 200 से अधिक संघठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं। जिसमें कुछ प्रमुख संगठन है जो संघ की विचारधारा को आधार मानकर राष्ट्र और सामाज के बीच सक्रिय है। वहीं कुछ राष्ट्रवादी, सामाजिक, राजनैतिक, युवा वर्गों के बीच में कार्य करने वाले, शिक्षा के क्षेत्र में, सेवा के क्षेत्र में, सुरक्षा के क्षेत्र में, धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में, संतो के बीच में, विदेशो में, अन्य कई क्षेत्रों में संघ परिवार के संघठन सक्रिय रहते हैं।
 संघ के अखण्ड भारत की परिकल्पना की नींव थी जनसंघ की स्थापना, जिसके बाद साल 1980 में भारतीय जनता पार्टी के रूप में इसने अपना विस्तार किया। 34 वर्ष की युवा भारतीय जनता पार्टी आरएसएस को अपना मातृ संगठन मानती है। यह भी जगजाहिर है कि लोकतंत्र के मंदिर में कभी 2 सदस्यों वाली यह पहली ऐसी गैर कांग्रेसी पार्टी है जिसके सबसे ज्यादा सदस्य संसद के दोनों सदन में हैं।
 भले ही आरएसएस को महात्मा गांधी की हत्या के आरोपों के चलते प्रतिबंधित किया गया हो, लेकिन उसके इरादे तब भी नहीं डोले..। इसमें कोई संदेह नहीं कि संघ के अखण्ड भारत के दृढ़ संकल्प और विश्व गुरू की परिकल्पना अब कहीं धरातल पर नज़र आती है। कहने का आशय यही है कि वसुधैव कुटुंबकम के ध्येय वाक्य के साथ संपूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति के प्रचार – प्रसार के साथ यदि संघ अपनी शाखाएं लगाकर अनुयायियों की संख्या में दिन-ब-दिन बढ़ोतरी कर रहा है, तो उन देशों में वहां की परिस्थिति के मुताबिक अनुशांगिक संगठनों का निर्माण भी कर सकता है। संघ विश्व के अन्य देशों में भाजपा की तर्ज पर अनुशांगिक संगठन के रूप में राजनैतिक दल की स्थापना कर उस देश की राजनीति में पैठ बनाने की राह में तो नहीं ? क्योंकि संघ के मुताबिक अखण्ड भारत में आज के अफगानिस्तान, पाकिस्तान, तिब्बत, नेपाल, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका आते हैं। इतना ही नहीं कालांतर में भारत का साम्राज्य में आज के मलेशिया, फिलीपीन्स, थाईलैंड, इरान, दक्षिण वियतनाम, कंबोडिया, इंडोनेशिया आदि भी शामिल थे, जिन्हें भारतीय संस्कृति से जोड़ने के अथक प्रयास संघ द्वारा विभिन्न माध्यमों खासतौर पर बौद्धिक सत्रों, आयोजनों के माध्यम से जारी हैं।
ज्ञात रहे कि यह भी अकल्पनीय था कि भारत में इतनी जल्दी कोई गैर कांग्रेसी सरकार सबसे ज्यादा सीटें जीतकर सत्ता पर काबिज़ होगी, इतना ही नहीं कांग्रेस मुक्त भारत के अभियान की ओर बढ़ती भाजपा अब अपने संकल्प को साकार करती नज़र आ रही है, जो कभी महज़ सपना सा लगता था। नि:संदेह इस लेख में निहित विचार निरीह कल्पना, हास्यास्पद या संघ के महिमामण्डन से प्रतीत होते हों, लेकिन विश्व के अधिकांश देशों में अपनी शाखाओं के माध्यम से विभिन्न कार्यक्रमों व अन्य आयोजनों के जरिये संघ अपनी पैठ बना रहा है। जैसे 1925 में संघ के (वर्तमान जितने) विस्तार और भारत पर शासन की परिकल्पना हास्यास्पद थी, वैसे ही भले भारत की धरती के बाहर संघ के (पुत्र संगठन) समर्थित राजनैतिक दल का सत्ताधीश होना अकल्पनीय प्रतीत होता हो, लेकिन जिस तरह से संघ धीमे – धीमे अपने वैचारिक संकल्प (अखण्ड भारत) की तरफ अनवरत कदमताल कर रहा है, यह अकल्पनीय कल्पना सच में अवश्य परिवर्तित होती प्रतीत हो रही है। शायद अखण्ड भारत की परिकल्पना या विश्व गुरू बनने का आधार यही हो ! गौरतलब है कि वामपंथ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की उपज में फर्क इतना ही है कि वामपंथ विचारधारा के उदय का मूल कारण एक वर्ग में उपजा असंतोष, क्रांति, हिंसा और शोषण था, लेकिन संघ के उदय का मूल कारण असंतोष या क्रांति नहीं अपितु भारतीय संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन है।
           कौन जानता था कि कभी 5 स्वयंसेवकों से जुड़ा संगठन विश्व का सबसे बड़ा संगठन बनेगा, कौन जानता था कि इसी संगठन का पुत्र संगठन (अनुशांगिक संगठन) विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को संचालित करेगा, कौन जानता था कि भारत के शीर्ष चार प्रमुख संवैधानिक पदों पर स्वयं सेवक सुशोभित होंगे, कौन जानता था कि भारत की धरती से बाहर निकल यह बड़ी संख्या में प्रसारित होगा और यह भी कौन जानता है कि भारत के अलावा दुनिया के अन्य देशों में इसके समर्थन से किसी देश की सत्ता का संचालन हो (?) शायद अखण्ड भारत या विश्व गुरू की परिकल्पना यही हो !
– सुदर्शन वीरेश्वर प्रसाद व्यास

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